• NRC-CAB: अधिकार होने के अधिकार की अस्वीकार्यता

    हर्ष मंदर

    December 14, 2019

    असम में नागरिकता से संबंधित विवाद राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से प्रारंभ नहीं हुए। इसके कहीं कोई संकेत नहीं हैं कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के अंतिम प्रकाशन से राष्ट्रीय नागरिकता संबंधित विवाद समाप्त हो जाएँगे और ये दुखद है। सामान्यतः यह याद नहीं रखा जाता कि केवल पंजाब व बंगाल ही नहीं अपितु असम का भी 947 में विभाजन हुआ था, जब एक जनमत संग्रह के माध्यम से सिलहट ज़िले को पाकिस्तान को स्थानांतरित कर दिया गया। सिलहट व बंगाल के अन्य भागों से असम की ओर प्रवास दो शताब्दियों तक जारी रहा, जिसे वृहद नवीन वनीय क्षेत्र एवं नदीय भू प्रभाग की लोलुपता तथा कृषि भूमि निर्मित करने के आकर्षण ने ईंधन मुहैया कराया और औपनिवेशिक राज्य द्वारा इसे प्रोत्साहित किया गया। इनमें से कोई भी अवैध नहीं था चैँकि यह एक देश था। 947 में विभाजन की भयावह॒ता और 97 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम ने असम में नए प्रवास को प्रेरित किया।

    1970 के दशक से तथाकथित स्थानीय लोगों द्वारा बाहरी लोगों के विरुद्ध किए गए विशाल व अनियमित हिंसक आंदोलनों ने राज्य की जड़ें हिला दीं। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का वर्तमान अद्यतन संघ सरकार के साथ असम आंदोलनकारियों द्वारा किए गए समझौते की प्रतिपूर्ति में किया जा रहा है। यह समझौता राजीव गांधी सरकार द्वारा किया गया था एवं इसके तहत 1971 के उपरांत पलायन करने वाले व्यक्तियों की पहचान व उन्हें निर्वासित करने का प्रावधान किया गया था।

    दशकों से भूमि, संस्कृति व प्रवास से संबंधित चिंताओं ने असम के सामाजिक व राजनीतिक जीवन में भयंकर संकट पैदा कर दिए हैं। रक्तपात हुआ व कई जीवन भी नष्ट हुए। असम के इतिहास में इस अशांत चरण का चरमकाल तब था, जब 1983 में नेलली में लगभग 3,000 बंगाली मूल के असमिया मुस्लिमों को – जिनमें से अधिकांश बच्चे व महिलाएँ थीं – कुछ ही घंटों में मार दिया गया। यह स्वतंत्र भारत का भूला हुआ नरसंहार है जिसके लिए एक भी व्यक्ति को मुकदमे का सामना नहीं करना पड़ा फिर दंड तो दूर की बात है।

    इन कड़वे विभाजनों के सभी पक्षों को उम्मीदु थी कि 1951 के राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को अद्यतन करने की 6 वर्षो की लंबी प्रक्रिया का निष्कर्ष लंबे समय से चल रहे विवाद को हल करने के रूप में होगा । कितु इस प्रक्रिया में लाखों निर्धन लोगों को मिली यातनाओं के बावजूद यह सिद्ध होता है कि इसमें किसी प्रकार का समाधान प्रदान नहीं किया गया है। किसी भी पक्ष के लिए इस जटिल विवाद से कोई नहीं है।

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    भाजपा सरकार के लिए असम तथा राष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश से आए घुसपैठियों का सफ़ाया, अनुच्छेद 370 के उच्छेदुन व राममंदिर के निर्माण की भांति ही अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है, परंतु भाजपा की परिभाषा के अनुसार केवल बंगाली मूल के असमिया मुस्लिम प्रवासी ही भारतीय राष्ट्र के लिए ख़तरा है। उनके अनुसार बंगाली हिंदू घुसपैठिए नहीं हैं अपितु शरणार्थी हैं जिनके लिए भारत प्राकृतिक आवास रहा है।

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    वहीं दुसरी ओर बंगाली मूल के असमिया के अनुसार असम प्रवासन के आँकड़े अतिश्योक्तिपूर्ण हैं एवं असम में स्थित बंगाली मूल के अधिकांश लोग वैध रूप से प्रवासित लोगों के वंशज हैं, जब यह एक देश था और 9 मार्च 1971 के उपरांत अवैध प्रवासन सूक्ष्म स्तरीय रहा है। उनके द्वारा घोषणा की जाती रही है कि यदि अवैध प्रवासन है भी तो वह बंगाली मुस्लिमों का नहीं है परंतु कोई उन्हें सुनने को तैयार नहीं है। उच्च स्तरीय ल्रुटिपूर्ण प्रक्रिया जो कि बंगाली मुस्लिमों के पूर्णतया विरुद्ध थी, के बावजूद अंतिम एनआरसी रिपोर्ट में उनकी अपेक्षाकृत निम्न संख्या उनके मत की पुष्टि करती है लेकिन यह एक मिथ्या आश्वासन मात्र है एवं किसी भी तरह इनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करता | क्योंकि समकालीन असम की प्रभावशाली राजनीतिक एवं बुद्धिजीवी व्यक्तियों की मंडली में कोई भी उच्च स्तरीय पदु पर आसतन्न व्यक्ति नहीं है जो सत्यनिष्ठा व नेतिक साहस से युक्त हो तथा यह स्वीकार करे कि उनके यह दावे ग़लत थे कि बड़ी संख्या में अवैध प्रवास दशकों से हो रहे हैं तथा उससे असम की संस्कृति व अखंडता संकट में पड़ गई है।


    हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हैं। वे सेंटर फ़ॉर इक्विटी स्टडीज़ के डायरेक्टर भी हैं।

    यह अंश लेफ्टवर्ड के वाम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तिका, "नागरिकता का काग़ज़ी खेल", से लिया गया है। इस अंश को सम्पादकों की अनुमति से यहाँ साझा किया गया है।

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