• अराजनैतिक बुद्धिजीवी

    कमल कान्त जैसवाल

    October 4, 2019

    Pablo Picasso: ‘The Charnel House’, 1945 | Image courtesy: Personal Interpretations
     

    अराजनैतिक बुद्धिजीवी

    एक दिन
    देश के अराजनीतिक बुद्धिजीवियों से 
    हमारी भोली-भाली जनता 
    करेगी कुछ सवाल।

    पूछेगी वह उनसे
    क्या किया था उन्होंने,
    जब मर रहा था उनका देश
    सांस दर सांस –
    एक मीठी, निपट अकेली,
    मद्धम आँच की तरह।

    नहीं पूछेगा
    कोई उनसे
    कि क्या पहनते थे वह। 

    या कि कैसे 
    एक शाहाना लंच के बाद
    लेते थे चैन की लम्बी नींद 
    अपनी आरामगाहों में।

    न जानना चाहेगा कोई  
    कि शून्यता की परिकल्पना को लेकर 
    क्या थे उनके 
    बेमानी तर्क वितर्क।

    न किसी को होगी 
    यह जानने में दिलचस्पी 
    कि कितनी गहरी है  
    उनकी अर्थव्यवस्था की समझ।

    न होगा कोई सवाल उनसे 
    ग्रीक मिथकों के गूढ़ रहस्यों पर।

    उस आत्मग्लानि पर भी नहीं
    जो उपजती होगी 
    इस अहसास के साथ 
    कि उनके अंदर 
    तिल-तिल करके 
    मर रहा है कोई
    एक कायर की मौत।

    न होगी कोई जिरह
    उनकी लचर दलीलों पर 
    जन्मती हैं जो 
    एक मुक़म्मल ज़िन्दगी से अनजान 
    अँधेरे सायों में। 

    उस रोज़ 
    आएंगे तुम्हारे पास 
    वह सीधे-साधे लोग। 

    वही, 
    जिनके लिए 
    नहीं थी कोई जगह 
    अराजनीतिक बुद्धिजीवियों की
    किताबों और नज़्मों में,
    मगर जो अलसुबह 
    उनके बंगलों पर
    लेकर आते थे 
    पावरोटी, दूध और अंडे। 

    या उनकी गाड़ियाँ चलाते थे, 
    उनके कुत्ते टहलाते थे, 
    उनके दिलकश बग़ीचों को 
    संवारते थे, सजाते थे,   
    और उनकी ख़िदमत में 
    दस्तबस्ता खड़े रहते थे।

    फिर वो पूछेंगे,
    "क्या किया था तुमने 
    जब ग़ुरबतज़दा ये लोग 
    लाचार  थे, 
    हलकान थे, 
    और उनकी मासूमियत, 
    उनकी मुस्कानें  
    फ़ना हो रहीं थीं 
    धुआं होकर?"

    उस रोज़ 
    मेरे प्यारे हमवतन, 
    अराजनीतिक बुद्धिजीवियो,
    देते न बनेगा 
    तुमसे कोई जवाब !
    तुम्हारी बेज़ुबानी ही 
    एक मनहूस गिद्ध बनकर 
    नोंच लेगी तुम्हारी अंतड़ियाँ। 

    एक बेपनाह मायूसी 
    तुम्हारी रूह को कचोटेगी, 
    घेर लेगी तुम्हें ताउम्र 
    एक ख़ामोशी,
    शर्मसार ख़ामोशी! 

    यह कविता ओतो रेने कास्तियो द्वारा स्पेनिश में लिखी गयी थी, जिसका अनुवाद कमल कान्त जैसवाल ने हिंदी में किया है। इस कविता का अंग्रेज़ी भाषांतर यहाँ पढ़ा जा सकता है। 


     

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