• ‘बहुजन’ सिर्फ जातियों पर आधारित होंगे?

    देवेंद्र चौबे

    June 29, 2018

    फोटो सौजन्य:Amazon.in

     

    पिछले कई दशकों और सदियों से साहित्य को परिभाषित करने की चेष्टा वैचारिक आंदोलनों के स्तर पर होती रही है। किसी ने कहा कि साहित्य जीवन का यथार्थ है तो किसी ने उसे समाज का दर्पण माना। कोई विचारधारा को ही साहित्य मानता है तो कोई आंदोलनधर्मी समाज को लेकर किए जा रहे लेखन को साहित्य की श्रेणी में रखने की मांग करता है। इसी प्रकार कोई साहित्य को जीवन का सहज प्रवाह मानता है जो लंबे समय से एक धारा ऐसी रही है, जो भाव और विचार के सम्मिश्रण को साहित्य मानने की वकालत करती रही है, लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आखिर साहित्य है क्या और क्या इसे किसी परिभाषा में तय करना जरूरी है? नब्बे के दशक में जब मंडल कमीशन लागू होने के बाद राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाएं शुरू हुईं, तो भारतीय समाज के बहुत बड़े समुदाय ने अपने लेखन को दलित साहित्य कहना शुरू किया।

    प्रसिद्ध कथाकार और 'हंस’ के संपादक राजेंद्र यादव और मार्क्सवादी आलोचक मैनेजर पांडे ने साहित्य में आए इस नए लेखन का स्वागत और समर्थन किया तथा अश्वघोष की रचना 'वज्रसूची’ के बहाने इस साहित्य की ऐतिहासिक व्याख्या करने की कोशिश की, लेकिन वहीं राजेन्द्र यादव ने एक सम्मेलन में जब दलित साहित्य को भारतीय समाज की वर्ण एवं जाति व्यवस्था में अनुसूचित जाति कहे जानेवाले समाज से हटकर एक बड़े कैनवस से इस साहित्य को जोड़ने की वकालत की, तब उनका भारी विरोध किया गया था, जबकि उनका सीधा लक्ष्य था कि दलित साहित्य के दायरे को विस्तृत किया जाए, ताकि शोषित और वंचित सामाजिक तबके के साहित्य को भी दलित साहित्य के दायरे में रखा जा सके।

    'फारवर्ड प्रेस’ जिस बहुजन साहित्य की अवधारणा को विकसित करते रहने की बात करता रहा है, हो सकता है आनेवाले समय में वह साहित्य की एक नई अवधारणा के रूप में स्थापित हो, यदि उसमें शूद्र, अतिशूद्र, आदिवासी समाज और स्त्री समाज जैसे अन्य शोषित और वंचित तबके भी शामिल हों, लेकिन यहां इस बात पर भी विचार किया जाना चाहिए कि क्या 'बहुजन’ का अर्थ सिर्फ यही सामाजिक समुदाय होंगे और क्या उनका संबंध सिर्फ जातियों पर ही आधारित होगा?

    दूसरी बात इस बहुजन की सैद्धांतिकी क्या होगी? कारण, कोई भी धारणा एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया के बाद निर्मित होती है। उसके केंद्र में व्यक्ति और समाज की मूलभूत समस्याएं होती हैं। उनसे समाज लगातार जूझता रहता है। मुक्त होने की कोशिश करता है और जड़ता इतनी बड़ी होती है कि कई बार उस समाज के मुक्त होने और एक नई स्थिति में आने में कई सदियां लग जाती हैं। भारतीय समाज में दलित समाज और वैश्विक समाज में अश्वेत समाज इसके उदाहरण के रूप में देखे जा सकते हैं। इसी प्रकार कबीर और नागार्जुन जैसे रचनाकार हिंदी साहित्य में ऐसे उदाहरण हैं, जिनके लेखन को बहुधा लोग साहित्य की श्रेणी में नहीं रखते हैं, जबकि ये दोनों रचनाकार अपने लेखन में व्यवस्था और समाज की जड़ता को तोड़ने का प्रयास करते हैं, उसके लिए एक सामाजिक चेतना विकसित करते हैं, यहां तक कि व्यवस्था की जड़ता को तोडऩे के लिए ये लेखक सामाजिक विरोध के स्तर तक जाते हैं। इस प्रकार के अनेक लेखक और व्यक्ति समाज में रहे हैं, जिनके तर्कसंगत मूल्यांकन के लिए ओबीसी आलोचना की जरूरत राजेंद्र प्रसाद सिंह को होती है तो नागार्जुन का मूल्यांकन कर किसी आलोचना की मांग की जाए? कारण, कबीर को तो कई आलोचक मिले, लेकिन नागार्जुन को कई मार्क्सवादी या प्रगतिशील और पारंपरिक आलोचक कवि मानते ही नहीं हैं। कुछ पारंपरिक आलोचक तो उन्हें पार्टी का परचा लिखनेवाला प्रचारक तक मानते हैं। मुझे लगता है कि लेखक के बदले उसके लिखे के मूल्यांकन के लिए एक तर्कसंगत पद्धति का विकास करने की जरूरत है।

    कई बार ऐतिहासिक और सामाजिक स्थितियों के साथ ही भौगोलिक स्थितियां भी लेखकों अथवा विचारकों के मूल्यांकन में बाधा उपस्थित करती हैं। कई बार ऐसी बाधा जान-बूझकर भी उपस्थित की जाती है, लेकिन सामाजिक सरोकारों से जुड़ा साहित्य या विचार समयानुसार अपनी अर्थवत्ता ढूंढ लेता है।

    जोतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने जाति-व्यवस्था और ब्राह्मणवादी जड़ता के खिलाफ जो आंदोलन शुरू किया, उसका व्यापक असर अपने समय के समाज पर दिखाई पड़ता है। हिंदी में 19वीं शताब्दी के आखिरी दशकों और 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में इन दोनों विचारकों की उपस्थिति राधामोहन गोकुल जैसे लेखकों के लेखन में दिखलाई पड़ती है। हिंदी के क्षेत्र में राधामोहन गोकुल इनके कार्यों की सिर्फ तारीफ ही नहीं करते हैं, अपितु उनकी अनिवार्यता भी बताते हैं, लेकिन गांधी और आंबेडकर के आने के बाद स्वाधीनता आंदोलन के दौर में हिंदी पट्टी की वैचारिकता राष्ट्रवाद से अधिक प्रभावित दिखलाई पड़ती है। लेकिन ऐसा नहीं है कि समाज व्यवस्था से जुड़े सवाल यहां अनुपस्थित हैं। चौथे दशक के प्रारंभ में अनेक ऐसे प्रयास होते हैं, जिन पर आंबेडकर और फुले का प्रभाव देखा जा सकता है।

    दरअसल, विचार और साहित्य की दुनिया मूलत: अपने समय के सवालों से टकराती है। कई बार उन सवालों में कुछ प्रसंग अनुपस्थित होते हैं, पर उससे यह नहीं मान लिया जाना चाहिए कि वे सवाल जरूरी नहीं हैं। कई बार हम साहित्यिक अवधारणाओं का विकास करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि समाज का जो स्थाई भाव है, वह किसी खास जाति या संप्रदाय की बजाय, समाज की मूलभूत समस्याओं से निर्मित होता है। उसमें मनुष्यता का भाव केंद्रीय भाव होता है और साहित्य या विचार इसी मनुष्यता के भाव को बचाने का प्रयास करते हैं। कबीर, जोतिबा फुले, भारतेंदु, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, महादेवी वर्मा, महात्मा गांधी, आंबेडकर, पेरियार, भगत सिंह, प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, फणीश्वरनाथ रेणु, राममनोहर लोहिया, चारु मजूमदार, फैज अहमद फैज, महाश्वेता देवी, यूआर अनंतमूर्ति आदि जैसे लेखक और विचारक अपने लेखन और आंदोलनों में जीवन के उसी स्थाई भाव को निर्मित करने का प्रयास करते हैं, जिससे मनुष्यता बची रहे और समाज सामूहिक चेतना के साथ-साथ विकास की प्रक्रिया का हिस्सा बने। बहुजन साहित्य की यदि धारणा निर्मित होती है तो उसके केंद्र में मनुष्यता के इसी भाव को बचाने का प्रयास होना चाहिए, जिससे कि समाज में विवेकशीलता बनी रहे।

    साहित्य हमेशा ऐसे ही सच के समर्थन में खड़ा होता है, जो लोक समाज को आगे ले जानेवाले होते हैं। सच के कई रूप हैं। जाहिर है सामाजिक असंगतियां भी हमारे समय के समाज की एक बहुत बड़ी सच्चाई हैं। नया साहित्य इन सवालों से टकरा रहा है और एक ऐसी चेतना विकसित करने का प्रयास कर रहा है, जिससे कि मनुष्यता बची रहे। अगर मनुष्यता बची रहेगी तो हमारी सामाजिकता भी बची रहेगी और यह दुनिया और बेहतर होगी।

    (फारवर्ड प्रेस, साहित्य वार्षिकी, मई, 2014)


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    देवेंद्र चौबे द्वारा लिखा गया ये अध्याय, प्रमोद रंजन और आयवन कोस्का द्वारा सम्पादित किताब,'बहुजन साहित्य की प्रस्तावना' का हिस्सा है और यहाँ फॉरवर्ड प्रेस की अनुमति से पुनः प्रकाशित किया गया है.
    

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