Sahir Ludhianvi’s Aawaz-e-Adam

The following is Urban Folk's rendition of Sahir Ludhianvi's "Aawaz-e-Adam".

दबेगी कब तलक आवाज़-ए-आदम हम भी देखेंगे

रुकेंगे कब तलक जज़्बात-ए-बरहम हम भी देखेंगे

चलो यूँही सही ये जौर-ए-पैहम हम भी देखेंगे

दर-ए-ज़िंदाँ से देखें या उरूज-ए-दार से देखें

तुम्हें रुस्वा सर-ए-बाज़ार-ए-आलम हम भी देखेंगे

ज़रा दम लो मआल-ए-शौकत-ए-जम हम भी देखेंगे

ये ज़ोम-ए-क़ुव्वत-ए-फ़ौलाद-ओ-आहन देख लो तुम भी

ब-फ़ैज़-ए-जज़्बा-ए-ईमान-ए-मोहकम हम भी देखेंगे

जबीन-ए-कज-कुलाही ख़ाक पर ख़म हम भी देखेंगे

मुकाफ़ात-ए-अमल तारीख़-ए-इंसाँ की रिवायत है

करोगे कब तलक नावक फ़राहम हम भी देखेंगे

कहाँ तक है तुम्हारे ज़ुल्म में दम हम भी देखेंगे

ये हंगाम-ए-विदा-ए-शब है ऐ ज़ुल्मत के फ़रज़ंदो

सहर के दोश पर गुलनार परचम हम भी देखेंगे

तुम्हें भी देखना होगा ये आलम हम भी देखेंगे