बोल | पाश, एक “खतरनाक” कवि

2007 में शिक्षा और संस्कृति पर संघ के मुतावातिर हमलों के तहत, RSS से जुड़े हुए शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने NCERT पर पाश की प्रमुख कविता “सब तों ख़तरनाक” के अनुवाद को XI कक्षा के कविता पाठ्यक्रम से हटाने के लिए दबाव डालना शुरू कर दिया |

पाश की कविताओं में ऐसा क्या है जिस से RSS को खौफ है? हम पाश से ऐसा क्या सीखेंगे जो कि RSS को मंज़ूर नहीं है? ये कि हमारे कवियों और शायरों ने एक धर्म निरपेक्ष, तरक़्क़ीपसंद हिंदुस्तान का सपना देखा और फिरकापरस्ती के विरोध में वो अपनी जान तक कुर्बान करने को तैयार थे |

आज जब कई कवि, कलाकार, और विचारक, हुकूमत के लिए “खतरनाक” बने हैं, शिक्षा और पाठ्यक्रमों को लगातार तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है, और आलोचना की संभावनाएं लगाकर संकुचित होती जा रही हैं, हम अवतार सिंह संधू 'पाश' को उनके जन्म दिवस पर याद करते हैं, कविता “ख़तरा है” के साथ, जो कि बहुत ही बेबाक़ ढंग से ये स्पष्ट करती है कि देश को सचमुच ख़तरा किस से है | इसे पढ़ा है ICF की अपर्णा और दानिया ने | कलाचित्रण हैं परिप्लब चक्रबर्ती के | पाश को पढ़ते हुए हम उम्मीद करते हैं की हमारे सपने और प्रतिरोध दिन-ब-दिन ऊर्जित होते रहेंगे |