370 के छिन जाने के बाद कश्मीर का मुस्तक़बिल क्या होगा?

कश्मीर का अपना एक इतिहास है जो विविधता से भरा हुआ है। धारा 370 हटाने के बाद पूरे जम्मू-कश्मीर में क्या बदलाव देखने को मिलेंगे ? वहाँ राजनीति क्या करवट लेगी ? ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब दे रहे हैं, डेविड देवदास।

निम्नलिखित है वक़्त की आवाज़ श्रृंखला की दूसरी किताब,  सुलगता कश्मीर, सिकुड़ता लोकतंत्र से एक अंश।

सौजन्य लाइव लॉ

प्रशांत : आपने क़रीब एक दशक तक वहाँ के हालात को नज़दीक से देखा है और उनके बारे में लिखा भी है। इसका दक्षिणपंथी नज़रिया तो ये है कि इसकी वजह से देश के क़ानून सुरक्षित हैं, लेकिन जहाँ तक बुद्धिजीवी समाज और कश्मीरी नेताओं का सवाल है, आपके हिसाब से अनुच्छेद 370 कितना ज़रूरी था और इससे उनकी अभिव्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ा है?

डेविड : देखिए, 370 कई सालों से था और लोगों के अनुसार उनके लिए बेहद ज़रूरी था। परन्तु 370 पहले भी खोखला कर दिया गया था और विचित्र बात तो यह है कि उसे और खोखला ही किया गया है, संविधान से हटाया नहीं गया है। और 35ए का मतलब है कि कश्मीर घाटी में किसी दूसरे राज्य से आ कर यहाँ ज़मीन नहीं ख़रीद सकते, इसी मुद्दे पर 2008 में काफ़ी बवाल हुआ था जब श्री अमरनाथ यात्रा श्राइन बोर्ड को ज़मीन का एक बड़ा प्लाट दे दिया गया था। जम्मू में कई लोग, ख़ासतौर से युवा वर्ग को इस बात की चिंता है कि कोई बाहर वाला आएगा और उनकी नौकरीछीन लेगा। यहाँ बात ज़मीन से ज़्यादा नौकरी की है। अगर हम नेताओं की बात करें, जिन्होंने कई सालों तक राज्य में शासन किया है, तो आपको बता दूँ  कि राज्य को मिलने वाले स्वत्व अधिकार दरअसल कें द्र सरकार से राज्य सरकार को मिले थे और वो अधिकार कभी जनता तक पहुँच ही नहीं पाए। अगर आरटीआई की बात करें, तो यहाँ उसके प्रावधान बाकी राज्यों की तुलना में कमज़ोर थे। पंचायती राज क़ानून में अधिकार पंचायत तक बहुत कम पहुँच पाए थे। परन्तु मैं ये कहना चाहता हूँ कि केंद्र सरकार के सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं। राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट देने का फ़ैसला कर तो दिया है, लेकिन केंद्र सरकार पे अब बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी आ गई है।

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प्रशांत : आपके काम का एक पहलू कश्मीर के युवा वर्ग के बारे में भी रहा है। आपकी किताब का नाम ही द जेनेरेशन ऑफ़ रेज  (The Generation of Rage) है, तो आपको क्या लगता है कि इस फ़ैसले का कश्मीर के युवा वर्ग पर क्या असर पड़ेगा?

डेविड : पिछले 30 सालों में, हिंसा और जब्र के बीच दो पीढ़ियाँ बड़ी हुई हैं, और पैदा भी हुई हैं। वो जंग के बच्चे है जो ग़ुस्से में हैं और वो बचपन से ही सदमे में हैं। जो पीढ़ी सदी के बदलाव के वक़्त पैदा हुई है, जिसे हम ‘मिलेनियल’ कहते हैं, उन्हें हमेशा यही सुनने को मिला था कि मुसलमानों पर दुनिया भर में ज़ुल्म किए जा रहे हैं। उन्होंने ज़मीनी स्तर पर अपने सामने हमेशा फ़ौज देखी हैं। दूसरी तरफ उनमे से बहुतों का नज़रिया इस्लामी राष्ट्रवाद और सर्व-इस्लामवाद का नज़रिया है। अब कश्मीर में सलफ़ी इस्लाम ने आवाम को ज़्यादा प्रभावित किया है। ज़ियारती इस्लाम – जिसे लोग सूफ़ी इस्लाम कहते हैं पर मैं उसे अलग तरह से देखता हूँ – यह 90 के दशक तक चलन में था, यहाँ तक कि लोगों ने जमात-ए-इस्लामी का सामना किया, हालांकि उस तंज़ीम ने 90 के दशक में ग़ैर आधिकारिक ढंग से हिज़्बुल मुजाहिद्दीन का साथ दिया था।

जो लोग ज़ियारतो में जाते हैं, वो छुपकर जाते हैं क्योंकि वो नहीं चाहते कि उन्हें देख कर कोई सोचे कि वो सलफ़ी इस्लाम से अलग हो रहे हैं ये पिछले 10-12 साल का हाल रहा है। युवा वर्ग को अलग-अलग ज़रियों से अकेलापन और निराशा महसूस कराई गई है।

मेरे ख़याल से 2008 के चुनाव में, जनता ने फ़ैसला किया था कि आख़िरी बार उस लोकतंत्र को आज़मा लें जिसका वादा किया गया था। वो निराश हुए। 2014 में बाढ़ आई थी, लेकिन लोग बाढ़ के कुछ हफ्तों बाद ही इलैक्शन बूथ पर गए और इस उम्मीद से वोट दिया कि उन्हें कुछ राहत मिलेगी, लेकिन उन्हें फिर से निराशा हाथ लगी। उन्हें तब भी निराशा हाथ लगी जब पीडीपी गठबंधन के साथ सत्ता में आई और ज़मीनी स्तर पर उसकी छवि आरएसएस सम्बं धित पार्टी के रूप में बन गई। लेकिन लोग तब भी उम्मीद लगाए बैठे थे कि उन्हें फ़ंड मिलेगा, राज्य का कुछ विकास होगा, उन्हें राहत मिलेगी, लेकिन इस बार भी उन्हें निराशा हाथ लगी। बल्कि 2015 में उधमपुर में गौरक्षा के नाम पर हिंसा की घटना हुई जिसका घाटी पर बहुत गहरा असर पड़ा था। बेशक देश के और हिस्सों से भी ऐसी ख़बरें आ रही थीं। तो इसकी वजह से गठबंधन में हलचल सी देखी गई।

दूसरी तरफ, लोग आम तौर पे, हर तरह के नेताओ से निराश हो गए थे। इसे याद रखिये कि हुर्रियत के लोगों को गिरफ़्तार किया गया लेकिन कोई विरोध, कोई हड़ताल नहीं हुई, कोई प्रतिक्रिया ही नहीं थी। यहाँ तक कि जब कुछ महीनों पहले जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाया गया, तब भी लोगों ने कोई विरोध नहीं किया। लेकिन इस आघात से शायद उनकी आस्था पर प्रभाव पड़ा है, क्योंकि जैसा मैंने बताया, 2008 के चुनावों से पहले, काफ़ी लोग इसे आख़िरी मौक़े की तरह देख रहे थे, लेकिन वो निराश ही हुए थे।

क़रीब पिछले एक साल से कश्मीर में भ्रष्टाचार एक बड़ा मसला रहा है और ये उम्मीद कि कम से कम भ्रष्टाचार तो ख़त्म हो जाएगा, ज़ाया ही गई है। 5 अगस्त से कुछ ही दिन पहले गवर्नर की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई थी, जिसमें कई पत्रकारों ने इस मुद्दे को उठाया था। कुल मिलाकर निराशा ही हाथ लगी है। और जहाँ तक कश्मीरी आवाम के अपने अस्तित्व का सवाल है, तो जिस तरह से कश्मीरियों के अधिकार छीन लिए गए हैं और राज्य को दो कें द्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया है, इसे बहुत से कश्मीरी बड़ा अपमान मानते हैं। देश भर में ऐसी कई पहचान हैं जो बहुत मज़बूत हैं, बंगाली पहचान उसका एक उदाहरण है। कश्मीर का इतिहास बड़ा व्यापक है। इसका इतिहास 1100 सीई (CE) में लिखा गया है और थिएटर, मेडिसिन, रसोई संबंधी कौशल में कई बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की गई हैं। कश्मीर की इन पहचानों को अब नियंत्रित किया जा रहा है।

जम्मू-कश्मीर में भी और तरह-तरह की पहचान वाले समुदाय हैं। बल्कि मैंने कई सालों तक ये कहा है कि जम्मू-कश्मीर शायद दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक विविधता वाला क्षेत्र है। ये बाल्कन से भी ज़्यादा विविध क्षेत्र है। मै शुक्र मनाता हूँ कि सरकार ने इसे तीन हिस्सों में नहीं बाँटा है। मेरी सबसे बड़ी चिंता थी कि सांप्रदायिक तनाव ना पनपे, क्योंकि चनाब घाटी के इर्द-गिर्द, हिंदू और मुसलमानों की आबादी 50:50 या 60:40 है, और काफी हद तक दोनों समुदाय शांतिपूर्वक रहे हैं।

लोकसभा में गृह मंत्री के बयान से ये अनुमान होता है कि अभी और चीज़ें होनी हैं। बल्कि गृह मंत्री ने लोकसभा में ऐलान कर दिया था की अगर आप ठीक तरह से बर्ताव करेंगे, तो मैं आपका राज्य आपको वापस कर दूंगा! ऐसे लेनदेन जैसी प्रतिक्रिया से लोगो के सामूहिक मन को ठेस पहुँचेगा और इससे ज़ुल्म का भाव भी पनपता है, लेकिन एक उम्मीद भी है कि शायद ऐसा हो सकता है। दरअसल 370 को हटाया नहीं गया है, बल्कि उसे कमज़ोर किया गया है। और वैसे भी 370 कई दशकों से खोखला हो चुका था। उसके बावजूद ये फ़ैसला उस वजह से आया है कि दशकों से भाजपा समर्थकों को वादे किए गए थे और उनको पूरा करना था। ये 1950 से हो रहा था, जब से भारतीय जन संघ बना था। लेकिन वो वादे भी पूरे नहीं हो सके हैं, क्योंकि 370 का अस्तित्व अभी तक है। कुल मिला कर काफ़ी विडंबना भरी स्थिति है।

यह अंश लेफ्टवर्ड के वाम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तिका, सुलगता कश्मीर, सिकुड़ता लोकतंत्र, से लिया गया है। इस अंश को सम्पादकों की अनुमति से यहाँ साझा किया गया है।
डेविड देवदास वरिष्ठ पत्रकार है। द स्टोरी ऑफ़ कश्मीर (The Story of Kashmir) और द जेनेरेशन ऑफ़ रेज इन कश्मीर (The Generation of Rage in Kashmir) इनकी प्रमुख किताबें हैं।