कोविड काल : बहुजनों के लिए आफतकाल

आजीविका का संकट 
यह तो स्थापित तथ्य है ही कि बहुजन समाज की विभिन्न जातियों के लोग मेहनत मज़दूरी करके अपना जीवन यापन करते हैं। अधिकांश लोग प्रवासी मज़दूर के रूप में रोज़ी-रोटी की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह पलायन भी करते हैं। इनमें ज्य़ादातर लोग ऐसे होते है, जो भूमिहीन हैं और अपने मूल निवास के क्षेत्र में रोज़गार नहीं मिलने के कारण  देश के विभिन्न राज्यों में श्रमसाध्य काम करने के लिए भ्रमण करते रहते है। लॉकडाउन की लंबी अवधि के चलते इन मेहनतकश लोगों के रोज़गार के साधन छिन गये है। दुकानें, ईंट-भट्टे, फ़ैक्ट्रियां, निर्माण मज़दूरी, खेत मज़दूरी आदि के बंद हो जाने से करोड़ों की तादाद में ग़रीब श्रमिक आजीविका के गंभीर संकट में फंस गये है।

राजस्थान के भीलवाडा ज़िले में जहां मेरा पुश्तैनी घर है, यहीं मैंने लॉकडाउन की अवधि गुज़ारी है। मैंने यहां से जाते हुए श्रमिक और यहां पर लौटकर आते हुए श्रमिक दोनों देखे हैं। यहां पर 200 से ज्य़ादा ईंट भट्टे हैं। चार सौ से ज्य़ादा टेक्सटाइल यूनिट्स हैं, जिनमें वस्त्र निर्माण का काम होता है । राजस्थान प्रदेश ईंट भट्टा मज़दूर यूनियन के मुताबिक़ इन ईंट भट्टों में  लगभग 20,000 श्रमिक नियोजित हैं। ये श्रमिक उत्तर प्रदेश के बांदा और चित्रकूट तथा बिहार के बांका, गया, भागलपुर तथा शैकपुरा आदि ज़िलों के निवासी हैं। इन श्रमिकों में से 95 फ़ीसद श्रमिक दलित पिछड़े बहुजन समाज के रैदास, लइया  (कादर) तथा मांझी समुदाय से आते हैं। कोरोना काल का सबसे अधिक ख़ामियाज़ा इन अति ग़रीब लोगों को भुगतना पड़ रहा है। अब हाल यह है इनको उदरपूर्ति और घर वापसी के लिए अपने जीवन के सबसे मुश्किल संकट का सामना करना पड़ रहा है। खाने का सामान ख़त्म हो रहा है। मालिकों ने काम बंद कर दिया है। मानसून आने ही वाला है, जिससे इनके रहवास की झोंपड़ियों के डूब जाने का ख़तरा है, पर इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

इसी तरह टेक्सटाइल फ़ैक्ट्रियों में कार्यरत लाखों मज़दूरों के साथ भी मुश्किलात पेश आ रही हैं। मालिक उन्हें घर बैठे वेतन देना नहीं चाहते और फ़ैक्ट्रियां भी लॉकडाउन के चलते चलाना नहीं चाहते हैं। हद तो यह है कि चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज ने प्रशासन से मांग की है कि मज़दूरों को स्पेशल ट्रेन से घर न भेजा जाये क्योंकि अगर वे वापस चले जाते हैं तो जब भी पूरी तरह से अनलॉक  होगा, तब मज़दूर कहां से लाये जायेंगे ? पूंजीवादी व्यवस्था कितनी भयानक है! इन्हें मज़दूरों की भूख, उनके वेतन, उनके स्वास्थ्य और उनकी सुरक्षित घर वापसी से कोई मतलब नहीं है। उन्हें तो सिर्फ़ सस्ते श्रमिक चाहिए जो इस देश में बहुजन समाज के रूप में मौजूद हैं।

खाद्य सुरक्षा का सवाल
लॉकडाउन जिस तरह लागू किया गया वह नोटबंदी जैसी ही मानव निर्मित आपदा बन गया है । इसके चलते सड़कों पर रहने वाले, बेघर, शहरी झोंपड़पट्टी के निवासी, घुमंतू जनजातियों के लोग तथा ग़रीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों को अचानक रोज़ी ही नहीं बल्कि रोटी तक से महरूम होना पड़ गया है। हालांकि सरकार ने राशन के राहत किट वितरित किये हैं, कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी पके हुए भोजन के पैकेट बांटे हैं, लेकिन यह व्यवस्था बिल्कुल  नाकाफ़ी सिद्ध हुई है। कई परिवारों में बड़ी तादाद में बच्चों की मौजूदगी देखी गयी जिन्हें 15 दिन के लिए 10 किलो सूखा राशन दिया गया। कहीं-कहीं तो महीने में महज़ एक बार ही अनाज और थोड़ी सी दाल व तेल मिला है जो इतना कम है कि उससे परिवार के लोगों की भूख नहीं मिटायी जा सकती।

यह भी देखने मे आया कि लॉकडाउन में लोग जब घरों में ही रहे, इस दौरान छोटे बच्चों के लिए दूध व पौष्टिक आहार की कोई व्यवस्था नहीं हो पाने से पहले से ही कुपोषण झेल रहे बच्चे व महिलाएं खाद्य सुरक्षा के गंभीर संकट से दो चार हो गये हैं। शनै: शनै: आ रही है विकराल  भुखमरी! साफ दिख रहा है कि आने वाले वक्त़ में यह कोरोना से भी बड़ा संकट बन जाने वाली है।

राहत कार्य में भेदभाव
वैसे तो दलित और आदिवासी समुदाय के लोग तरह तरह के शोषण व भेदभाव से पीड़ित होते ही हैं, लेकिन कोरोना काल में विभिन्न स्थानों से आयी ख़बरों से पता चलता है कि राहत के लिए बांटी गयी सामग्री में भी भेदभाव हुआ है तथा 'रिवर्स माइग्रेशन' के पश्चात गांव में पहुंचे वंचित वर्ग के लोगों को मनरेगा जैसी योजनाओं में काम दिये जाने में भी भेदभाव किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में वंचित समाज के लोग कैसे जीवन बचा पायेंगे क्योंकि उनके पास अब न तो काम है, न खेती के लिए ज़मीनें हैं!  वे अपने परिवार का पालन पोषण कैसे करेंगे !

 घुमंतू समुदायों का दुख
 ट्रेनों में खेल दिखाकर भिक्षावृत्ति करने वाले, कठपुतलियों का प्रदर्शन करने वाले, घर घर जाकर गाना गाने वाले, नृत्य दिखाने वाले  तथा जंगली जानवरों के ज़रिये मनोरंजन करने वाले, एक स्थान से दूसरे स्थान जाकर आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां बेचने वाले, शहरी क्षेत्रों में कचरा बीनने वाले, लाल लाइटों पर फूल बेचने वाले तथा वाद्य यंत्र बजाने व बेचने वाले और ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को इस लॉकडाउन ने बेरोज़गारी व भुखमरी के मुंह में धकेल दिया है। इन दिनों पूरे के पूरे शहर बंद रहे हैं। ट्रेन व बसें नहीं चली हैं। ऐसी स्थिति में इन लोगों के लिए कमाई का कोई भी ज़रिया नहीं बचा जिससे वे अपनी ज़िंदगी चलाने के लिए कोई काम कर सकें। अकेले राजस्थान में घुमंतू समुदाय की ऐसी 32 जातियां है, जो एक स्थान से दूसरे स्थान जाकर अपना जीवन यापन करती हैं, देश भर में ऐसे डिनोटिफाइड जनजाति समूहों की संख्या 600 से भी ऊपर है तथा इनकी आबादी करोड़ों में है। कोविड-19 के चलते  लागू लॉकडाउन में घुमंतू ,अर्ध घुमंतू व विमुक्त जातियों के सामने नयी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं, जिसके लिए वे कभी तैयार नहीं थे। इन समुदायों के लिए विशेष आर्थिक पैकेज की ज़रूरत है। लेकिन, सत्ता इनके संकट को अलग से देख पाने में सक्षम नहीं है।

कोरोना से भी भयानक वायरस
राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो तथा विभिन्न प्रदेशों के पुलिस मुख्यालयों से प्राप्त आंकड़ों पर नज़र डालें तो लॉकडाउन की अवधि के दौरान आपराधिक घटनाओं में अप्रत्याशित रूप से कमी आने के दावे किये जा रहे हैं। कुछ हद तक यह सही भी है। लोग कोविड-19 के भय से बाहर कम ही निकले हैं, इसीलिए लूटपाट, क़त्लोगारत, अपहरण आदि आपराधिक मामलों में कमी आना स्वाभाविक है। मगर इस संक्रमण काल में दलितों व मुसलमानों के प्रति नफ़रत में, भेदभाव में बढ़ोतरी हुई है।

क्वारंटीन सेंटर्स में दलित रसोइयों के हाथ का बना खाना नहीं खाने से लेकर दलित स्वास्थ्य कर्मियों से, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ जातिगत भेदभाव के कई मामले इस दौरान उजागर हुए हैं। यहां तक कि कोरोना वारियर्स के रूप में कार्यरत दलित आदिवासी कार्मिकों के साथ जातीय दुर्व्यवहार तथा अन्याय अत्याचार के प्रकरण सामने आ रहे हैं। इस तरह हम देख सकते हैं कि कोरोना जैसी प्राकृतिक आपदा से भी लोगों ने कोई सबक़ नहीं सीखा है ।

शायद कोरोना की जल्द ही वैक्सीन बन जायेगी, मगर जाति के आधार पर घृणा का वायरस तब भी लाइलाज ही बना रहेगा। अभी से यह साफ़ दिखायी दे रहा है कि हाशिये के समुदायों के लिए आने वाले समय मे कईं चुनौतियां प्रतीक्षारत हैं। दलित आदिवासी व घुमंतू जातियों को काम की कमी के चलते गांवों में फिर से बेगार करनी पड़ सकती है। न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं मिलने की आशंका है। बच्चों की शिक्षा, महिलाओं की सुरक्षा तथा गरिमापूर्ण आजीविका को लेकर कई तरह की मुश्किलें आने वाली हैं। 

प्रवासी श्रमिकों के प्रति पलायन के बाद से गांवों में अभी से आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक वर्चस्व के लिए टकराव की स्थितियां दिखने लगी हैं, जो कभी भी हिंसक झगड़ों का रूप धारण कर सकती हैं।

कोरोना के बाद का यह वक्त़ दलित, आदिवासी, घुमंतू, तथा अल्पसंख्यक समाजों के लिए सबसे भयानक चुनौती वाला साबित होने जा रहा है, जहां उन्हें अराजकता, आजीविका के संकट, खाद्य असुरक्षा, जातिजन्य भेदभाव व शोषण और भुखमरी तथा बेकारी से जूझना है। यह कोविड काल देश के दलित बहुजन आबादी के लिए एक घनघोर अंधेरी रात बनता जा रहा है जिसकी फ़िलहाल कोई सुबह नज़र नहीं आ रही है। बहुत सारी नयी चुनौतियां मुंह बायें खड़ी हैं जिनसे जूझना आसान नहीं होगा।