बात बोलेगी : इश्क की नई इबारत लिखती सड़कों पर बैठी औरतें

देश के कोने-कोने में बैठीं औरतें एक नया इतिहास रच रही हैं। वे लिख रही हैं मोहब्बत की इबारत, वे लिख रही हैं बगावत की इबारत। उनकी मोहब्बत में उनका वतन, समाज, परिवार और निश्चित तौर पर उनके दिल की धड़कनें। घरों से बाहर निकलकर दिन-रात सड़कों पर एक करते हुए, मौसम की बुरी से बुरी मार झेलते हुए इश्क की फौलादी ताकत का अहसास पूरी दुनिया को कराया। यहां तक की गोली मारने वालों को -फूल बरसाओ सारो पर देश के पियारो पर—का नारा लगाकर, जवाब दिया। देश की राजनीति को इतने दिल-फरेब रंगों से रंगने वाली यह आधी आबादी `प्रबुद्ध ‘ रचनाकार को जब निठ्ठली बैठी नज़र आती हैं और वे उन्हें सीमापर स्वेटर-मौजे बुनने की सलाह देते हैं, तो तकरीबन उम्र की नानी शाहीन बेगम कहती हैं, `हम तो अपने मुल्क से मोहब्बत में यहां कफ़न बांधकर बैठें है, हमारा काम तो यही है। हमें सलाह देने से पहले वह दो-तीन रात सड़क पर गुजारे तो, फिर वे क्या बीनेंगे, यह हम देखेंगे। ’ उनका यह कहना था कि आसपास बैठी सभी औरतें खिलखिलाकर उठी, मंच का संचालन करने वाली इजरा ने कहा, `मर्द को दर्द तो होगा ही न। हम खुदमुख्तार हो गई हैं। हमारे घरों के मर्दों ने जितना स्पोर्ट किया उसकी आधी भी समझदारी ये पढ़े-लिखे दिखाते तो शायद हमारी तकलीफें कम होतीं। वैसे भी हमने अपनी मोहब्बत पर किसी की मुहर मांगी नहीं है, उन्हें जो करना हो कहे, करना हो करे, हमारी बला से…’

औरतों की जो सृजनात्मकता फूटी है, वह अपने आप में बेमिसाल है। यहां आप कहीं भी जाएं, वे अपनी बात कभी नज़्म में ढालकर कहती मिलती हैं, तो कहीं तीखे व्यंग्य में सजाकर पेश करती हैं। नारों को गुंजाने की कला पर तो जो उन्होंने महारत हासिल की है, उसके क्या ही कहने। उन्हें देखकर कोई कह ही नहीं सकता है कि वे पहली-पहली बार घरों से बाहर निकली है। लखनऊ के घंटाघर में सना का यह कहना दिल में खुब जाता है—वतन से अपनी मोहब्बत का पहली बार इस तरह से खुलेआम इजहार किया है। इसकी महक और ताकत पहली मोहब्बत जैसी है। पहला प्यार, पहली मोहब्बत को लेकर जितनी बेहद नाजुक, बेहद ख़फीफ सी कल्पनाएं लोगों के ज़ेहन में तारी रही हैं उन सब पर सतरंगी ब्रश फेर रही हैं ये लड़कियां, ये महिलाएं, ये भारतीय नागरिक।

दिल्ली का शाहीन बाग हो, खुरेगी हो, चांद बाग हो, जामिया हो, जामा मस्जिद हो, निजामुद्दीन हो, जाफराबाद हो, लखनऊ का घंटाघर हो, उजरियावं हो या बिहार के पटना का सब्जीबाग, समनपुरा, या गया, आरा या झारखंड का रांची…देश का कोई भी इलाका, जहां नागरकिता संशोधन कानून, एनपीआर और एनआरसी से जम्हूरियत को बचाने के लिए औरतें सड़कों पर निकली हैं, वे बिल्कुल अलग कविता रच रही हैं, अलग वितान बना रही हैं—नई आजादी की नई लड़ाई का आगाज़ कर रही है।

उनकी नज़्में बिल्कुल अलग तेवर की हैं। लखनऊ के उजरियांव गांव में मुलाकात हुई रूबीना अयाज़ से, जो खुद को एक पेशेवर कवि के तौर पर पेश करती हैं। वह यहां के धरने की संचालक सहर के साथ दिन-रात एक किए हुई हैँ। अपने पेशेवर सारे अपॉन्टमेंट रद्द करके मुल्क की खिदमत में मौजूद हैं। सुनिए उनकी नज़्म –इंकलाब-इंकलाब

ऐसी ही प्रतिरोध की बुलंद स्वर है कवीश अजीज लेनिन, जो मूलतः गोरखपुर की रहने वाली हैं। लखनऊ में पत्रकार हैं, कवि हैं औऱ फोटोग्राफर हैं। जब घंटाघर में धरने पर बैठी औरतों पर योगी सरकार ने जुल्म ढाया , पानी भर दिया, कंबल छीन लिए, खआना खराब कर दिया, उस समय अपनी एक नज्म मोबाइल पर रिकॉर्ड करके सोशल मीडिया पर शेयर की। जबर्दस्त वायरल हुई ये नज़्म—रवायतों को तोड़कर निकल पड़ी हैं बेटियां । आइए सुनते हैं—

नज़्मों-कविताओं-व्यंग की बहार है। चंद हम आपके साथ सांझा कर रहे हैं और यह प्रक्रिया चलती रहेगी। वजह यह है कि ये लेखनी आग से भरी है औऱ इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना तमाम वतनपरस्त लोगों का मकसद होना चाहिए। ऐसी ही नज़्म है डॉ. जरीन की। डॉ. जरीन शाहन बाग के पास ही रहती हैं और एक अस्पताल चलाती हैं। जब भी समय मिलता है, यहीं आ जाती हैं। उन्होंने लिखा—

तू सबसे अलगतू सबसे जुदा

एक आग है तू जज़्बात है तू

नाज़ुक भी तू फौलाद भी तू

इंसाफ की एक आवाज़ है तू

शाहीन की एक परवाज़ है तू

हस्सास भी है होशियार भी है

मासूम भी है ख़ूंख्खवार भी

ऐसी अनगिनत प्रतिभाएं शआहीन बाग की आग से तप कर बाहर निकल रही है। अभी तक उन्हें ज़माने ने देखा नहीं था, उन्हें जगह नहीं मिली, कोई प्लेटफॉर्म नहीं मिला था। अब ये उनका मंच है। ऐसी दुनिया जिसकी हिफाज़त वे खुद ही सुबहोशाम कर रही हैं।

कबीर के शब्द जिंदा मिसालें बन रहे हैं–हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या

रहें आजाद या जग में, हमन दुनिया से यारी क्या

जो बिछुड़े हैं पियारे से भटकते दर-ब-दर फिरते

हमारा यार है हम में, हमन को इंतजारी क्या

यहां किसी का इंतजार नहीं है, हालांकि वे प्रधानमंत्री से कहती हैं कि हमने तुम्हें चुना है और तुम्हें हमारी बात सुननी ही होगी। यही लोकतंत्र की पहली शर्त है। यह नई इबारत है, यह जो न देख पा रहा है, उसने संविधान से आंखे मूंद रखी हैं और उसका देशप्रेम संदेह के घेरे में हैं।