हरे सांप: दो कविताएं

Shoili Kanungo, ‘Leaf’, Ink and watercolor on paper, 2013

 

मिर्चें

मिर्चें झाड़ से गुच्छे में
फूट पड़ती हैं आड़ी टेड़ी
कैसी भी हरी झक
लेकिन जब ये सूख जाती हैं
बिन खाद पानी और हवा के
तब ये अकड़ पड़ती है
लाल होकर
अपने तेवर के साथ
एक एक बीज
आग उगलने लगता है जिव्हा पर
और धधक पड़ता है
शरीर की रग रग में
इंकलाब बनकर।।


हरे सांप

हरे सांप, काले सांपों की तरह
गुलामी के पिटारे में नहीं फसते
और न ही छुपने के लिए तलाशते हैं
चूहों के बिल
वे संगठित होकर
फुंकारते हैं दूर से ही अपने दुश्मन को
जो लालच का दूध दिखाकर पुचकारते हैं
वे नकार देते हैं झट से
उन तक पहुंचने वाली कटोरियों को
उन्हें मालूम है
दूध उनके जोश को
होश को
हक़ों और उसूलों को दरकिनार कर
छीन लेगा उनका हौंसला
और जकड़ लेगा अपनी गिरफ्त में
वे बीन की धुन से भी आकर्षित नहीं होते
वे भांप लेते हैं दूर से ही सपेरों की चालसाजी को
और हरी घांस की रहनुमाई में
बुनते हैं अपने वजूद की लड़ाई
वे बिलों में नहीं ठहरते
उनके वास
दरख्तों की टहनियां और हरे पत्तों की छाँव में मिलते हैं
इसलिए वे दूर रहते हैं सपेरों की पकड़ से
वे लड़ते हैं मरते दम तक
अपने हक़ों हुक़ूक़ और आज़ादी के लिए
और बचा लेते हैं
अपने अस्तित्व को शातिर सपेरों से
जो काले सांपों को तमाशा बनाकर
उन्हें रगड़ते आये हैं सदियों से
गुलामों की तरह बड़ी आसानी से।।

The Testimony
Vaasanthi | Translated by Sukanya Venkataraman
Lotus Pond in Decay
Three paintings by A Ramachandran
Merit and Reservation
PN Gopikrishnan, Translated by Prasad Pannian