• एक लोकतांत्रिक और साहसी जवाब की उम्मीद में

    जस्टिस अजीत प्रकाश शाह

    February 7, 2020

    जिस समय नागरिकता संशोधन क़ानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का विरोध पूरे देश में जारी है, तमाम पक्ष-विपक्ष इसी प्रश्न से तय हो रहे हैं कि भारतीय संविधान के लिए भारत का तसव्वुर क्या रहा है। एक लम्बी उपनिवेशवाद-विरोधी लड़ाई के मूल्यों को सँजोने वाला हमारा संविधान हिंदू महासभाई और मुस्लिम लीगी संकीर्णता को नकार कर ही वजूद में आया था। वह धर्म, जाति, लिंग, प्रांत, भाषा आदि के आधार पर देश के नागरिकों में भेद नहीं करता। उसकी निगाह में किसी की दावेदारी कम या ज़्यादा नहीं है। कहने की ज़रूरत नहीं कि भारत की ऐसी संवैधानिक संकल्पना को दरकिनार करने की कोशिशें जब-तब तेज़ होती रही हैं, और जब-जब ऐसा हुआ है, इस संकल्पना को पुनर्नवा करने वाला वैचारिक उद्यम भी तेज़ हुआ है।

    निम्नलिखित है वक़्त की आवाज़ श्रृंखला की छठी किताब,  किसका संविधान, किसका देश? से एक अंश।

    नागरिकता संशोधन कानून न्यायपालिका के लिए एक ऐतिहासिक क्षण बन चुका है। इस क्षण का संदेश यह है कि अब समय आ गया है कि न्यायपालिका अपनी आवाज दुबारा हासिल करे; हकलाने से इनकार करे; खुलकर बोले और पीछे की गलतियों का निराकरण करे।

    नागरिकता कानून में किए गए हालिया संशोधनों के बाद जो नया कानून बना है, उसने मुझे और बहुत सारे लोगों को विचलित कर दिया है। इसमें कोई शक नहीं है कि यह कानून स्वयं ही समस्यामूलक है और अगर इसके साथ राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) मिला दिया जाए तो समस्या कई गुना बढ़ जाती है। जब असम में एनआरसी लागू हुआ था तो पीपुल्स ट्रिब्यूनल का मैं भी एक हिस्सा था, और हमने पाया कि हालांकि सभी काम न्यायालय के संरक्षण में हुए थे, तब भी यह बहुत ही भयावह परिणामों वाली एक विनाशकारी क़वायद थी। 

    नागरिकता (संशोधन) कानून-2019 (सीएए) के बाद विरोध-प्रदर्शनों का होना आश्चर्यजनक नहीं था, लेकिन विरोध-प्रदर्शन करने वालों के साथ जिस प्रकार का बर्ताव किया गया, वह निश्चय ही आश्चर्यजनक है। छात्र-छात्राओं के नेतृत्व में हुए शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों में कानून-व्यवस्था के तंत्र की प्रतिक्रिया के कारण हिंसा की घटनाएं हुईं तथा देशभर में संपत्ति का नुकसान हुआ, जो कि बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह उस समय-काल का प्रतिबिंब है जिसमें हम रहते हैं और यह इंगित करता है कि अब हमारे देश में युवाओं को अपना आने वाला बहुत ही महत्वपूर्ण समय ऐसे नेतृत्व से भिड़ने में लगाना है जो कि पूरी तरह से सांप्रदायिक और एकाधिकारवादी है। 

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    धार्मिक राष्ट्रवाद के बारे में 

    आप पूछ सकते हैं कि आखिर यह बड़ी योजना (ग्रैंड डिजाइन) क्या है। पहली नजर में, सीएए का निहितार्थ उन व्यक्तियों को अलग-थलग करना है जिनकी पहचान मुस्लिम समुदाय से संबंधित होती है। यदि आप कानून की समझ को सीमित कर देते हैं, जैसा कि सरकार चाहेगी, और अगर इसे केवल अप्रवासियों पर ही लागू किया जाए, तो यह कानून अपने आप ही मुस्लिम अप्रवासियों को दूसरे दर्जे के प्राथमिकता देगा जब वे भारतीय जमीन पर होंगे चाहे उन्होंने भारत तक की लंबी यात्रा उन्हीं कारणों (गरीबी, राजनीतिक उत्पीड़न आदि) से की हो जिनके चलते उनके हिंदू या ईसाई पड़ोसी बाहर निकले हों। अगर आप इस कानून को लेकर अपनी समझ को बढ़ाएं, जैसा कि सरकार ने प्रकट रूप से किया है (सीएए को एनआरसी से जोड़कर), तो इसका निहितार्थ भारत में सभी मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना है। ऐसा करने से यह कानून और नीति धर्मनिरपेक्षता, बंधुत्व और मानवता के मौलिक संवैधानिक सिद्धांतों को न केवल उलट देती है बल्कि नष्ट भी कर देती है। 


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    हिंदुत्व के आइकन जैसे कि विनायक दामोदर सावरकर और उनके जैसों द्वारा फैलाए गए सांस्कृतिक और धार्मिक राष्ट्रवाद की विचारधारा, साथ ही सावरकर द्वारा प्रतिपादित “हिंदू राष्ट्र (राज्य), हिंदू जाति (नस्ल) और हिंदू संस्कृति” के आदर्श में इसकी जड़ें हैं। धार्मिक राष्ट्रवाद के रूप में, यह विचारधारा एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना करती है जिसमें हिंदू शासन हो, यानी अखंड भारत में हिंदू राष्ट्र, जो इस विश्वास पर आधारित है कि केवल हिंदू ही ब्रिटिश इंडिया के भू-भाग पर अपनी पैतृक भूमि यानी पितृभूमि और उनके धर्म की भूमि यानी पुण्यभूमि के रूप में दावा कर सकते हैं। इस संदर्भ में, मुसलमानों और ईसाइयों को विदेशी के रूप में देखा जाता है जो कि भारत के भू-भाग के लिए देशज (मूल निवासी) नहीं हैं, और जिनके धर्म की उत्पत्ति पृथक पवित्र भूमि में हुई थी। 

    इस आख्यान (नैरेटिव) से मेरी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि आपकी कल्पना से भी ज्यादा कारणों से संबंधित है। 1940 के दशक में मेरे नाना हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे और मेरे स्कूल के दिनों में जिन पहले लेखों से मेरा परिचय हुआ वे सावरकर के थे। सन् 1938 में अपने लेखों में, जब हिटलर अपने चरम पर था, सावरकर ने यहूदियों को लेकर हिटलर की नीतियों और उन्हें अपनी मातृभूमि से खदेड़ने को सही ठहराया था। उन्होंने कहा, “एक राष्ट्र उसमें रहने वाले बहुसंख्यकों से बनता है। जर्मनी में यहूदियों ने क्या किया? वे अल्पसंख्यक थे और जर्मनी से खदेड़ दिए गए।” बाल्य अवस्था में मैंने जो पढ़ा और उसे ग्रहण करते हुए तथा उनकी कविताओं की प्रशंसा (आज भी ) करते हुए, मैं एक संस्थान के रूप में महासभा पर हमेशा सवाल उठाता रहा, और यह समझने की कोशिश करता रहा कि उनकी कार्रवाइयों को कौन सी बात उकसाती थी। उस समय भी, सावरकर के विषय में जो बात मुझे विशेषकर आश्चर्य में डालती थी, वह थी सावरकर का उस समय के फासीवादी तानाशाहों के लिए जुनून, खासतौर से हिटलर और मुसोलिनी के लिए। 

    हाशियाकरण, बहुसंख्यकवाद और संवैधानिकता पर हिंदू महासभा और उसके वारिसों की सैंद्धातिक स्थिति लगातार एक समान बनी हुई है, लेकिन अपनी इस निरंतरता में उन्होंने हिंदू राष्ट्र के काल्पनिक विचार को पकड़े रहने और सांस्कृतिक, भाषाई तथा धार्मिक रूप से विविधतापूर्ण आधुनिक भारत की सच्चाई से दो-चार न होने के दोष भी उद्घाटित किये हैं। 


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    चूंकि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) अनैतिक है, लोगों का आंदोलन अवश्यंभावी है और आवश्यक भी है, वरना वे मौलिक सिद्धांत जिन पर भारत की संवैधानिक संकल्पना आधारित है, एक ऐसी चीज के लिए बर्बाद हो जाएंगे जो हमेशा के लिए गहरे जख्म छोड़ सकती है।

    न्यायपालिका की आवाज की तलाश : क्या यह एक निर्णायक मोड़ हो सकता है

    नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ हो रहे विरोध-प्रदर्शनों के मद्देनजर, जैसा कि बताया गया है, भारत के प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अगर लोग/प्रदर्शनकारी ‘सड़कों पर उतरना’ चाहते हैं, तो उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाने की कोई आवश्यकता नहीं। कुछ लोग इस वाक्य को इस चेतावनी के रूप में भी पढ़ सकते हैं कि न्याय पाने के लिए अच्छा व्यवहार पहली आवश्यकता है। लोकतंत्र में किसी भी घटना में विरोध-प्रदर्शन और न्यायपालिका की शरण में जाना ऐसे विकल्प हैं जो लोगों को वैध रूप से उपलब्ध हैं। वास्तव में, असहमति या विरोध लोकतंत्र की जीवनरेखा है। लेकिन जब पूरा समाज एक इकाई के रूप में विरोध-प्रदर्शन कर रहा हो तो न्यायपालिका को क्या करना चाहिए? ऐसे हालात में, जैसे कि अब हो रहे हैं, प्रदर्शनकारियों को अच्छा या बुरा घोषित करने के लिए कोई स्पष्ट रेखा नहीं खींची जा सकती। 

    ऐतिहासिक रूप से, उन हालात को सँभालने के मामले में, जहां वे ही अंतिम मध्यस्थ हों, भारतीय अदालतें एक बहुत ही रंगबिरंगा इतिहास रखती हैं। विशेषकर जब इनका सामना किसी ताकतवर कार्यपालिका से हो, तो अदालतें डगमगाने की प्रवृत्ति रखती हैं, आपातकाल को इसके उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। आज की पीढ़ी के न्यायाधीशों के पूर्ववर्तियों ने चालीस वर्ष पूर्व भारत के लोगों के साथ जो भी गलत किया था, उसको ठीक करने के लिए यही ऐतिहासिक घड़ी है। हम बड़ी उत्सुकता के साथ इस क्षतिपूर्ति का इंतजार कर रहे हैं। हम उन क्षणों का बहुत ही बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं जब हमें ‘किसका संविधान, किसका देश?’ जैसे प्रश्नों का लोकतांत्रिक और साहसी उत्तर मिलेगा। 


     “इन सीएए नैरिटिव, फाइंडिंग द ज्यूडिशिएरीज लॉस्ट वॉइस” लेख का यह थोड़ा संपादित और अनुवादित रूप है। यह लेख अंग्रेजी दैनिक द हिंदू  में 28 दिसंबर, 2019, को पहली बार प्रकाशित हुआ था।

    जस्टिस अजीत प्रकाश शाह दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे हैं। वह भारतीय विधि आयोग के अध्यक्ष भी थे।

    यह अंश लेफ्टवर्ड के वाम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तिका, किसका संविधान, किसका देश?, से लिया गया है। इस अंश को सम्पादकों की अनुमति से यहाँ साझा किया गया है।

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