• शाहीन बाग़ की कहानी

    अनवर अब्दुल्लाह

    January 22, 2020

    जो बन गयी एहतेज़ाज की निशानी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,

    तामीर ना की थी ख्वाबो में,
    ये आ बैठेंगी राहों में,
    जुल्म-ओ-सितम जब हद से बड़ जाए,
    तब हक़ की बात भी आनी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,

    ये बेटी हैं, ये बहने हैं, ये बीवी हैं और माएँ भी,
    ये इंकिलाब की आग भी हैं और हैं ममता की छाएँ भी,
    सारी सिम्तों में दूर तलक,
    हमें इनकी बात सुननी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,
    माना था तुमने जिनको सिफ़र,
    कर दिया है देखो कैसा ग़दर,
    तारीख़ को ये दोहराएँगी,
    ये आज की झाँसी रानी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,

    मत समझो तुम इनको अबला,
    ये इंकिलाब का हैं क़िबला,
    ये चाओखट लांघ के आयीं,
    इन्हें हर दीवार गिरानी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,
    मेरी माँ ने मुझको जनम दिया और पाला है,
    और यहाँ पे बैठी माँओं ने फिरसे ज़िंदा कर डाला है,
    हम अपना खून बहा देंगें,
    गर इनकी आँख में पानी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,

    ये कमला है ये सलमा है,
    यहाँ तारा भी आलमारा है,
    नाम है इनके अलग अलग,
    पर पूछो तो हिंदुस्तानी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,
    ये शाहीन बाग़ की कहानी है,
    जो बन गयी एहतेज़ाज की निशानी है।


    अनवर अब्दुल्लाह दिल्ली में रहते हैं और सीए के छात्र हैं।

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