नागरिकता अधिनियम में संशोधन के बहाने भारत के संविधान पर हमला

अब तक हम नारा देते रहे हैं: "संविधान बचाओ, देश बचाओ" | लेकिन संविधान के लिए खतरा क्‍या हैं और किस बाबत से संविधान की रक्षा करनी है, यह चित्र हमें कुछ समझ नहीं आता था । दि. १०-११ दिसंबर को हमें संविधान पर खतरे का एहसास हुआ, जब हथौड़ा हमारे सिर पर-दिल पर पड़ा: "साबित करो कि तुम भारत के नागरिक हो !"

मेरा जन्म इस धरती पर हुआ, मेरे पूर्वज को इस धरती में दफनाया और अग्निसंस्कार दिया गया । मेरे बच्चे इस धरती पर पैदा हुए । यह पृ थ्वी-वायु-जल-आकाश-प्रकाश किसी भी राजनीतिक दल द्वारा नहीं बनाया गया | अब क्या मुझे यह साबित करना पड़ेगा कि मैं इस देश का नागरिक हू?

१३० करोड़ भारतियों के मन में-दिल में नागरिकता के साबुत मांगकर यह आग लगाने का क्‍या कारण है? क्‍या यह नागरिकता का प्रमाण देने की बात है या कुछ धर्मों के लोगों से उनकी नागरिकता छीन लेने की बात है?

इस सवाल की चर्चा आसाम राज्य से शुरू हुई । बांग्लादेश सीमा पर सटे इस राज्य में १९७९ में आंदोलन शुरू हुआ था ।

कोई एक लोकसभा सीट पर अप्रत्याशित भारी मतदान के कारण, यह मतदान विदेशी घुसपैठियों दवारा किया गया यह समझा गया और इसलिए विदेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए आंदोलन किया गया | यह आंदोलन १९८४ में समाप्त हुआ ।

इतिहास में थोड़ा पीछे जाएं तो हमारी समाज में आयेंगा की घुसपैठायो का मुद्दा कहाँ से शुरू हुआ | तत्कालीन प्रधानमंत्री इंढि गांधीने पाकिस्तान के उत्पीड़न को खत्म करने के लिए पाकिस्तान को विभाजित करने का कदम उठाया था । पश्चिमी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में स्थानीय असंतोष को सहायता कर भारतीय सेना की मदद से कांग्रेस के दवारा पाकिस्तान को दो भागों में विभाजित किया और एक नया देश बना 'बांग्लादेश' | इस स्थिति में, बांग्लादेशसे कई हिंदूमुस्लिम शरणार्थी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (असम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल) में आए | भारत ने मानवता के आधार पर सभी हिंदूमुस्लिम शरणार्थियों को आश्रय दिया, लेकिन इन आश्रय देने वाले राज्यों में समस्याएं पैदा हुईं ।

१९३१ की जनगणना के अनुसार, त्रिपुरा राज्य में आदिवासियों की आबादी ५६.३६ % थी, जो २०११ में घटकर २८.४४ रह गई है | स्थानीय लोगों की आबादी कम हो गई और साथ साथ उनके हाथों में जो संसाधन थे, जैसेकि भूमि, रोजगार, राजनीतिक शक्ति वह सभी में भी गिरावट आई । ऐसा ही असम में हुआ । पिछले १० वर्षों में आसामी भाषा बोलने वालों की संख्या में आधे प्रतिशत की कमी आई है और बंगाली बोलने वालों की संख्या में १.५% की वृद्धि हुई है | बड़ी संख्या में शरणार्थियों के असम पहुंचने के कारण मतदाता का नक्शा बदल गया है । स्थानिक राजनेता हिन्दू शरणार्थीको भाजपा की वोट बैंक समझते है और मुस्लिम शरणार्थियों को विपक्ष की वोट बैंक ।

असम आंदोलन छह वर्षों तक चला । अंत में एक समझौता हुआ, जिसे 'असम समझौता' के नाम से जाना गया | इस समझौते में यह तय हुआ की "जो लोग २४ मार्च, १९७१ से पहले असम में आये हैं, उन्हें भारत के नागरिक' माना जाएगा, फिर वो हिन्दू हो या मुसलमान |" अब रही बात घुसपैठि कौन है, इसका पता लगाने की । घुसपैठियोंको ढूंढ निकालनेके लिए यह निर्णय लिया गया कि एक 'एनआरसी' (राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण रजिस्टर) बनाया जाएगा । भाजपा ने २०१४ के लोकसभा चुनावों के प्रचार में कहा था कि लाखों मुसलमानों ने असम में प्रवेश किया है और इनको चुन- चुनकर बाहर निकाला जाएगा | २०१९ में पंजीकरण पूरा हो गया । सुप्रीम कोर्ट ने भी यह पंजीकरण का समर्थन किया | इस पंजीकरण की प्रक्रिया छह साल तक चली | भाजपा की गिनती उल्टी हो गई । १९ लाख घुसपैठियों की सूची सामने आई जिन में उनकी अपेक्षाके विरुद्ध ६० फीसदी 'हिंदू थे । इस पंजीकरण करने के लिए १२,००० करोड़ रु. खर्च हुए | भाजपाने खुद अपेक्षा जैसा परिणाम नहीं मिलने पर इस पंजीकरण का विरोध किया और घोषणा करी की असम में यह पंजीकरण फिर से करवाया जाएगा और पूरे भारत में इसी तरह का पंजीकरण किया जाएगा । संक्षेप में, भाजपा अपने राजनीतिक हितों के लिए उसको जैसा चाहिए वैसा पंजीकरण करना चाहती है, जिसमें हिंदू घुसपैठियों को नागरिकता मिले लेकिन मुसलमानों को नहीं ।

२०१९की साल में दलित शक्ति केंद्र में प्रशिक्षण लेने आनेवाले आधे से अधिक युवाओं के पास खुद की जन्म तिथि की जानकारी नहीं है, तो वे अपने ८० साल के माता-पिता की जन्मतिथि और वह भारत में पैदा होने का प्रमाण कहां से लाएंगे?

यह एक बात है | दूसरी बात संविधान की मूल जड़ को खत्म करने की है । लोकसभा और राज्यसभा में 'नागरिकता सुधार विधेयक' १०-११ दिसंबर २०१९ को मंजूर हुआ । राष्ट्रपति ने जैसे इंतजारमे हो ऐसे तुरंत इस विधेयक पर अपनी मुहर लगा दी और यह विधेयक 'कानून' बन गया | असलमे, एक कानून गैज़ेटमे छपेगा तब ही कानूनकी तौर पे अमलमे आएगा । कानून के खिलाफ बढ़ते आन्दोलनकी वजहसे राष्ट्रपतिकी मुहर के १२ दिन बाद भी सरकारने इसको गैज़ेट में छपवाया नहीं | इस कानून के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:

भारत के दो पड़ोसी देश, पाकिस्तान और बांग्लादेश और एक थोडा दूर बसा अफगानिस्तान, यह तीनों मुस्लिम बहुमतवाले देशों में से; जो लोग धार्मिक उत्पीड़न से परेशान होकर भारत आए हैं, भारत उन्हें 'नागरिकता' देगा, लेकिन शर्त यह है कि ऐसे लोग,

1. हिंदू, सत्रिस्ती, शिख, जैन, पारसी और बाँद्ध हो ।

2. ये लोग मुस्लिम न हो ।

भारत बहुमत के बल पर किसी एक धर्म का देश न बन जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए डॉ. बाबासाहेब अंबेड़कर ने भारत के संविधान में अनुच्छेद १४ को दाखिल की । जिस का अर्थ यह है कि, "धर्म, नस्ल, जाति, ज्ञाति या भाषा को छोड़कर भारत के सभी नागरिक समान है। कानून के समक्ष सभी समान हैं और कानून का सभी को समान संरक्षण मिलेगा। सरकार ऐसे कोई कानून नहीं बना सकती जिसकी वजहसे समानता का भांग हो जाये।"

मनुस्मृति की विचारधारा और धार्मिक उत्पीड़न के शिकार दलितों को मुक्त करने के लिए डॉ. आंबेडकर ने २५ दिसम्बर १९२७ को मनुस्मृति को जला दिया था । मनुस्मृति दहन में डॉ अंबेडकर के साथ अन्य हिंदू नेता भी थे । डॉ. अंबेड़चर का विरोध किसी 'धर्म 'के खिलाफ नहीं था, बल्कि धर्म के नाम पर फैलाए जा रहे 'अधर्म' के खिलाफ था।

भारत का संविधान सभी जातियों, धर्मों और भाषाओं के सभी निर्वाचित सदस्यों द्वारा १९५० में अपनाया गया था | आज ७० साल बाद भाजपा और उसके सहयोगी दल 'समानता' के मूलभूत अधिकारको खंडित कर तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं | यह सीधा हमला भारत के सभी अल्पसंख्यकों और संविधान को माननेवाले नागरिकों पर है | यह जानबूझकर किया जा रहा है ताकि देश में धार्मिक असंतोष फैल सके और भारत के संविधान की नींव 'धर्मनिरपेक्षता' है, वह टूट जाए और साम्प्रदायिकता के बल पर अभी की सरकार की सत्ता बनी रहे और अल्पसंख्यक लोग इस देश में दूसरे दर्जे के शरणार्थी
बन जाए |

इस षड़यंत्र को सजाने के लिए और यह कदम सभी अल्पसंख्यको के हित में है, यह छबि बनने के लिए हिंदू शरणार्थाीओ के साथ ईसाई शीख, जैन, पारसी और बौद्ध को भी जोड़ा गया हैं ।

१०० साल पहले गुजरात में भारत माता के दो बेटे पैदा हुए थे; गांधी और सरदार। जिन्होंने भारत को आजाद करवाने की अगुवाई करी । इतना ही नहीं, आजाद भारत में सभी धर्म, भाषा और जातियों के समान अधिकार वाले एक 'धर्मनिरपेक्ष' और एकात्मक देश बना दिया | वैचारिक तौर पर गांधी-सरदार के विचार डॉ. अम्बेडकर से मिलते नहीं थे, लेकिन संविधान के प्रारूपण की जिम्मेदारी डॉ. अम्बेडकर को सौंपी थी | आज गुजरात के दो नेता गांधी-सरदार-अंबेडकर की टोपी पहनकर अखंड भारत को खंडित करने की अगुवाई कर रहे हैं ।

सवाल यह है कि देश में कितने घुसपैठि हैं ? संसद में गृहमंत्री ने कहा कि नागरिकता कानून में संशोधन से लाखों करोडो लोगों को राहत मिलेगी, लेकिन उनके शब्दों में सच्चाई नहीं है | दिनांक 3१.१२.२०१४ को लोकसभा में जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल २ लाख ८९ हजार १४१ घुसपैठि (जिनके पास भारत में रहने की अनुमति नहीं है) हैं । इन में से बांग्लादेशी १,०३,८१७, श्रीलंकन १,०२,४६७, तिब्बत से ५८,१५५, म्यानमार (बर्मा) से १२,४३४, पाकिस्तान से ८७९९ और अफगानिस्तानसे ३,४६९ हैं।

पीड़ितों को रोटी देना-आश्रय देना यह भारत की सैकड़ों वर्षों पुरानी 'वसुधैव कुटुंबक्म की संस्कृति है । इसलिए कानून में इस तरह के संशोधन पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती है। लेकिन पीड़ितों को धर्म के आधार बांटना और एक को सहारा देना और दूसरे का त्याग करना यह राजनीतिक पार्टी की संस्कृति हो सकती है, भारत की नहीं। इसके अलावा, यह भारत के संविधान के अनुच्छेद १४ के खिलाफ है।

इस सुधार-नए कानून ने पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में आग लगा दी है | असम के साथ हुआ समझौता के अनुसार २४ मार्च, १९७१ के बाद असम में आए लोगों को नागरिकता नहीं दी जाएगी, लेकिन नया कानून यह कहता है कि, ३१.१२.२०१४ के पहले से ही रहने वाले लोग (जिनमे सिर्फ हिंदू, ईसाई, बोॉद्ध, शीख और जैन) 'नागरिक' माने जाएंगे | असम समझौते के सख्त अमल करवाने का भरोसा दिलाने पर पहली बार उत्तर-पूर्व भारत के सात राज्यों में भाजपा को अन्य दलों के साथ सत्ता मिली।

अब आग बुझाने के लिए अरुणाचलत्र प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड राज्यों को यह बात कहकर समझाया जा रहा है कि आपका राज्य इस नए कानून से प्रभावित नहीं होगा। इन चार राज्यों में आदिवासी आबादी वाले दस जिलों में 'इनर लाइन परमिट' को संविधान की छठी अनुसूची के अनुसार लागू किया गया है ।'इनर लाइन परमिट' का मतलब है कि "कोई भी बाहरी व्यक्ति आबादी इन क्षेत्रों की पंचायत से अनुमति प्राप्त किए बिना इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकती है ।" मूलतः अंग्रेजों ने अपने व्यवसाय की एकाधिकार सत्ता को बनाए रखने के लिए 'इनर लाइन परमिट' का प्रावधान किया था ।

यह सच है कि स्थानीय पंचायत की अनुमति के बिना कोई भी व्यक्ति इस क्षेत्र में नहीं जा सकता है । हालांकि इन चार राज्यों में कुल मिलाकर ६१ जिले हैं और इनमें से केवल १० जिलों में ही 'इनर लाइन परमिट' का प्रावधान है ।

जब भाजपा धार्मिक उत्पीड़न के पीड़ितों को आश्रय देने की बात कर रही है तब एक तथ्य उन्हें याद दिल्राना है कि भारत के नागरिक होने के बावजूद आजादी के ७३ साल बाद भी दलित भेदभाव और उत्पीड़न से पीड़ित हैं और वे क्‍यों समान नागरिक नहीं बन पा रहे हैं? हिंदू होने के बावजूद वह मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते है और हिंदू होने के बावजूद उनको सार्वजनिक कब्रिस्तान में न तो दफन किया जा सकता है न तो उसका अंतिम संस्कार किया जा सकता ! यह धार्मिक उत्पीड़न है या और कुछ ? जिन दलितों के द्वारा शीख, ईसाई, मुस्लिम और बाँद्ध धर्म अपनाया गया है; वे सभी इस तरह के धार्मिक उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं, भले कम मात्रामे हो | क्या भारतकी १६.५ प्रतिशत आबादी वाले २१.५ करोड़ दलितों के अधिकारों की रक्षा और उन्हें धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए कोई रास्ता है क्‍या ?

२०१४ के लोकसभा चुनावों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों को मीला बहुमत केवल और केवल दलितों और आदिवासीयों की आरक्षित सीटों की वजह से मिला है । फिर भी इस सरकार के शासन में दलित-आदिवासियों पर अत्याचार बढ़े हैं, ऐसा इस सरकार के स्वयं के आंकड़ों से पता चलता है और इन अत्याचारों को रोकने में विफल रही केंद्र सरकार, अब दूसरे देश में रहने वाले लोगों का दुःख मिटाने की बात कर रही है इसमें कितना दम है?

लेकिन दो चीजें दीया के प्रकाश के समान साफ-स्पष्ट हैं:

एक, सब से अधिक मुस्लिम घुसपैठि आबादी जहां होनेका प्रचार किया जाता है उस पश्चिम बंगाल में २०२१ में विधानसभा चुनाव है और इस समस्या से सब से अधिक पीड़ित असम में भी । धार्मिक हिंसा फैलाकर चुनाव जीतना यह पुरानी रसम है ।

दूसरी बात नागरिकता के सबूतों को खोजने और इकट्ठा करने के लिए १३० करोड़ लोगों को इस तरह काम में लगा देना ताकि देश में भय का माहौल बना रहै ऐसी गिनती इस राजनीति में स्पष्ट दिखाई दे रही है ।

अगर असम में ऐसा नागरिक-पंजीकरण की लागत १२,००० करोड़ रुपये है, तो भारत के सभी २८ राज्यों और ९ केंद्र शासित प्रदेशों में इस तरह के पंजीकरण करने के लिए लगभग ५ लाख करोड़ रुपये का खर्च आएगा ! भारत में आज भी धान नहीं मिलने से लोग भूखमरी से मर जाते हैं । लाखों बच्चे कुपोषित हैं और बालमृ त्युमे ६९% बच्चे कुपोषित पाए जाते हैं | हम कुपोषण के मामले में पाकिस्तान और अफगानिस्तान से कम प्रगतिशील है और जबकि बेरोजगारी की दर बढ़ रही है | इसमें कोई संदेह नहीं है कि निराश लोगों का ध्यान भुखमरी और बेकारी से हटाने के लिए इस तरह की तबाही एक प्रभावी साधन है!

आज भारत की जनता के लिए सबसे ज्यादा दुःखद घटना यह है, जो जामिया मित्रिया उस्मानिया विश्वविद्यालय में हुई है । जहां केंद्र सरकार के सीधे नियंत्रण में आनेवाली दिल्‍ली पुलिसने विश्वविद्यालय से अनुमति प्राप्त किए बिना विश्वविद्यालय के हॉस्टल पुस्तकालय और बाथरूम में घुसकर लड़कों और लड़कियों की बेरहमी से मारपीट की। इस तरह का अत्याचार तो अंग्रेजों ने भी भारत के जनता पर नहीं किया गया था! विचारों को व्यक्त करने का मूल अधिकार डॉ. अम्बेड़कर द्वारा संविधान के प्रारूप में प्रदान किया गया है | यह हमला संविधान के ऊपर सीधा है ।

भारत के नागरिकों के रूप में हमें विकल्‍प चुनने का समय आ गया है। क्‍या हमें संविधान में दिए गए 'समानता' के मौलिक अधिकार को बरकरार रखना चाहिए या नहीं? क्‍या हमें देश की धर्मनिरपेक्ष संरचना की जिससे लोग देश में धर्म, नस्ल, जाति, ज्ञाति या भाषा के भेद के बिना प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में रह सकें या क्या हमें ऐसी स्थिति निर्माण करनी है, जहां साम्प्रदायिक बहु मान के आधार पर हिंदू राष्ट्र का निर्माण किया जाए ?

एक बात हमें समझ लेनी चाहिए कि हिंदु में जात्पांत के विभाजन के कारण सभी हिंदु समान नहीं हैं | इसलिए जब बात हिंदु राष्ट्र की आती है तब मलाई तो उपर के 5 प्रतशित वालों के हिस्से में ही आती है और अन्यों के हिस्से में गुलामी | इस असमानता को दूर करने के लिए संविधान में अनुच्छेद 5 में सभी वर्गों को विकास का समान मौका देने का मूलभूत अधिकार दिया गया है | इस अधिकार के तहत ही ओबीसी (अन्य पीछड़े वर्ग) को डॉ. अंबेड़कर के सिद्धांत के अनुसार आरक्षण दिया गया है|

अब हमारी लड़ाई यह होना चाहिए:

'नागरिकता सुधार अधिनियम' को वापस लिया जाए और देश के नागरिकों के राष्ट्रीय पंजीकरण कार्यक्रम को शुरू होने से रोक दिया जाए।

इस मुद्दे पर विचार करने और अगले कार्यक्रम को तैयार करने के लिए २५ दिसंबर, २०१९, 'मनुस्मृति-दहन दिवस' पर सुबह ११: ०० बजे दलित शक्ति केंद्र में एक कार्यक्रम का आयोजन किया है।