शिरीन दलवी और याक़ूब यावर की पुरस्कार वापसी पर बयान

 

नागरिकता संशोधन क़ानून के ज़रिये केंद्र की भाजपा सरकार ने भारतीय राज्य और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर जो प्रहार किया है, उसके ख़िलाफ़ दो उर्दू लेखकों की पुरस्कार वापसी एक स्वागत-योग्य क़दम है| "द वायर" और "द इंडियन एक्सप्रेस" में छपी ख़बर के मुताबिक़, मुंबई की लेखिका और पत्रकार शिरीन दलवी और बनारस के लेखक-अनुवादक याक़ूब यावर ने क्रमशः महाराष्ट्र साहित्य अकादमी के पुरस्कार और यूपी उर्दू अकादमी के लाइफ़टाइम एचीवमेंट अवार्ड को वापस करने की घोषणा की है| ‘अवधनामा’ अख़बार के मुंबई संस्करण की सम्पादक रह चुकी शिरीन दलवी ने 2011 में मिले पुरस्कार की वापसी की घोषणा करते हुए सीएबी को "असंवैधानिक" और "अमानवीय" बताया है| उन्होंने कहा, “हमें अपने संविधान और अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब की हिफ़ाज़त में खड़ा होना होगा|” बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त श्री याक़ूब यावर ने 2018 में मिला अवार्ड वापस करने की घोषणा करते हुए कहा कि वे सीएबी के पास होने से मायूस हैं, उम्र के कारण वे इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन में शारीरिक रूप से ज़्यादा योगदान नहीं कर सकते, इसलिए अवार्ड वापस कर अपना विरोध ज़ाहिर कर रहे हैं|

जनवादी लेखक संघ/अंजुमन जम्हूरियतपसंद मुसन्नफ़ीन दोनों महत्त्वपूर्ण लेखकों के इस फ़ैसले का इस्तिक़बाल करता है|

लेखकों-कलाकारों के पुरस्कार-वापसी अभियान ने 2015 के आख़िरी महीनों में साम्प्रदायिक फ़ासीवादी ताक़तों के ख़िलाफ़ एक बड़ा जन-मत बनाने का काम किया था| नरेंद्र दाभोलकर और गोविन्द पानसरे के बाद प्रोफेसर कलबुर्गी की हत्या और दादरी में अखलाक़ की भीड़ के हाथों हत्या के बाद वह अभियान स्वतःस्फूर्त तरीक़े से सामने आया था और उसने ऐसे तमाम लोगों को हालात की गंभीरता के प्रति जागरूक बनाया था जो इन घटनाओं में छिपे ख़तरनाक इशारों को नहीं पढ़ पा रहे थे| नागरिकता संशोधन क़ानून और राष्ट्रीय स्तर पर नागरिकता पंजी बनाने की योजना को मिलाकर आरएसएस-भाजपा जिस तरह का साम्प्रदायिक अभियान छेड़ने की साज़िश में लगे हैं, उसका जनता के सामने पर्दाफ़ाश करना और उसके ख़िलाफ़ जन-मत का निर्माण करना इस समय की मांग है| लेखक और बुद्धिजीवी इस काम में आगे बढ़कर अपनी भूमिका निभा रहे हैं| उर्दू के दो अदीबों ने पुरस्कार वापस कर इस विरोध को गुणात्मक रूप से एक नया मोड़ देने का काम किया है| निश्चित रूप से, इस समय भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बचाने के लिए, लेखन के ज़रिये नागरिकता संशोधन क़ानून के सारतत्त्व और उसकी मंशाओं को सामने लाने के साथ-साथ विरोध के अन्य रूपों को भी अपनाने की ज़रूरत है|   

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
राजेश जोशी (संयुक्त महासचिव)
संजीव कुमार (संयुक्त महासचिव)