साहित्य और संघर्ष: कुछ पत्र और दो नज़्में

प्रगतिशील लेखक संघ के लेखकों की तहरीरों को पढ़ते हुए, संजय मुट्टू और समन हबीब ने "आसमां हिलता है जब गाते हैं हम" कार्यक्रम को रूप दिया, जो 13 अक्टूबर को स्टूडियो सफ़दर, दिल्ली में आयोजित किया गया।

इस भाग में हम सुनेंगे कुछ ख़त जो प्रगतिशील लेखकों ने एक दुसरे को लिखे थे और मजाज़ की दो नज़्में — "सुना है बंदोबस्त अब सब बा-अंदाज़-ए-दीगर होंगे" और "मेरा सफ़र"।


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