• मैं लिखना चाहता हूँ: एक युवा कश्मीरी की कविता

    अज्ञात

    August 27, 2019

    Image courtesy Reuters

    मैं लिखना चाहता हूँ
    बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ
    क्योंकि एक घुटन है जो भरना चाहता हूँ
    मैं कुछ महसूस अब कर नहीं पाता
    मैं कोई इंसान अब बन नहीं पाता

    मैं लिखना चाहता हूँ ताकि तुम भी सुनो
    मेरे माँ बाप और पड़ोसी ज़िंदा रहे या मार दिए जाएँ
    ये सोच के ज़र्रा भर भी अब दुःख नहीं होता 
    कुछ लोग तो मर ही जाएंगे जैसे होता आया है इस अटूट अंग में
    मौत कब रिश्तों के नाम से रुकी है यहाँ 

    मैं लिखना चाहता हूँ ताकि तुम भी देखो
    कोई बीमार दवाई से महरूम हो गया
    किसी और बच्चे की आँखें तबाह हुई
    कुछ झेलम में डूब रहे हैं 
    कोई लाश अपनों की आखरी नज़र को तरस रही
    कोई जेल की दीवारों पे ईद लिख रहा
    पर ये सब सुनके भी, मुझे ज़र्रा भर दुःख नहीं होता
    ऐसी हालत का कहीं अब इलाज नहीं होता

    मैं लिखना चाहता हूँ ताकि तुम भी महसूस करो
    मुझे याद है अम्मी का वो कहना
    इस रस्ते मत जाना तुम्हे कुछ हो ना जाये
    मुझे याद है वो घर के टूटे दरवाज़े
    जिसे हम ने थक हार के टूटा ही छोड़ दिया
    क्यूंकि तोड़ने वाले जाने कब फिर आ जाएँ
    मुझे याद है उस पुराने स्कूल की मिट्टी की दीवारें
    जहाँ बन्दूक की नोक पे वो वोट थे डलवाते
    मुझे याद है वो मायूसी और ख़ामोशी
    जो मेरे माँ बाप कभी मुझे समझा नहीं पाए

    मैं लिखना चाहता हूँ ताकि पूछ सकूँ
    क्या तुम फिर से हमारे पहाड़ों पे रेत के ढेर बना दोगे?
    क्या तुम फिर हमारी नदियों को लाल कर दोगे?
    क्या तुम फिर चिनार की छाँव में नफ़रत भर लाओगे?
    क्या तुम फिर मेरी आवाज़ छीन के मेरी आवाज़ बन जाओगे?
    क्या तुम फिर हमारा बचपन क़ैद कर दोगे?
    मैं लिखना चाहता हूँ, एक बार तुम्हारी आँखों में देख के
    मैं तुम्हारी परछाई से भी घबराता हूँ
    मुझे लगता है तुम्हे मेरी ज़ात से नफ़रत है
    मुझे डर है की तुम ख़फ़ा ही रहोगे
    मैं मर भी जाऊँ तो मेरे ख़याल से भी क्या ख़फ़ा रहोगे?
    मुझे बतलाओ मैं क्या बन चला हूँ?

    बहुत रोकता हूँ खुद को कुछ लिखने से
    क्या लिखूं फिर वही सिलसिला जो बरसों से है देखा
    पर अब लगता है ये सब बेमानी है
    क्या ये लिखने से मुझे भी तुम आतंकवादी कहोगे?
    मैं तुम्हारे लिए कोई नहीं हूँ 
    मेरा वजूद भी तुम्हारे लिए बेमानी हो चुका है
    आवाज़ों की इस जमघट में, मैं लिखना चाहता हूँ,
    ऐसी ज़िन्दगी से अगर तुम्हे भी डर सा लगे
    तो बेहसी ढलने से पहले तुम खुद को बचा लेना
    पर अगर तुम्हे ये सब जायज़ लगे
    तो मेरे डर को अपनी जीत का परचम बना लेना

    पर मैं लिखना चाहता हूँ, ताकि एक बात कह सकूँ
    मुझे तुम्हारे वादों और मन की बात से नहीं है मतलब
    जो मन करे वो सब कुछ ले के जाओ
    मैं तो बस एक बार फिर से रोना चाहता हूँ
    ताकि खुद को ज़िंदा महसूस कर सकूँ
    वो एहसास जाने मैं कब खो चला हूँ
    मैं लिखना चाहता हूँ, मैं लिखना चाहता हूँ


     

    Donate to the Indian Writers' Forum, a public trust that belongs to all of us.