मैं लिखना चाहता हूँ: एक युवा कश्मीरी की कविता

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मैं लिखना चाहता हूँ
बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ
क्योंकि एक घुटन है जो भरना चाहता हूँ
मैं कुछ महसूस अब कर नहीं पाता
मैं कोई इंसान अब बन नहीं पाता

मैं लिखना चाहता हूँ ताकि तुम भी सुनो
मेरे माँ बाप और पड़ोसी ज़िंदा रहे या मार दिए जाएँ
ये सोच के ज़र्रा भर भी अब दुःख नहीं होता 
कुछ लोग तो मर ही जाएंगे जैसे होता आया है इस अटूट अंग में
मौत कब रिश्तों के नाम से रुकी है यहाँ 

मैं लिखना चाहता हूँ ताकि तुम भी देखो
कोई बीमार दवाई से महरूम हो गया
किसी और बच्चे की आँखें तबाह हुई
कुछ झेलम में डूब रहे हैं 
कोई लाश अपनों की आखरी नज़र को तरस रही
कोई जेल की दीवारों पे ईद लिख रहा
पर ये सब सुनके भी, मुझे ज़र्रा भर दुःख नहीं होता
ऐसी हालत का कहीं अब इलाज नहीं होता

मैं लिखना चाहता हूँ ताकि तुम भी महसूस करो
मुझे याद है अम्मी का वो कहना
इस रस्ते मत जाना तुम्हे कुछ हो ना जाये
मुझे याद है वो घर के टूटे दरवाज़े
जिसे हम ने थक हार के टूटा ही छोड़ दिया
क्यूंकि तोड़ने वाले जाने कब फिर आ जाएँ
मुझे याद है उस पुराने स्कूल की मिट्टी की दीवारें
जहाँ बन्दूक की नोक पे वो वोट थे डलवाते
मुझे याद है वो मायूसी और ख़ामोशी
जो मेरे माँ बाप कभी मुझे समझा नहीं पाए

मैं लिखना चाहता हूँ ताकि पूछ सकूँ
क्या तुम फिर से हमारे पहाड़ों पे रेत के ढेर बना दोगे?
क्या तुम फिर हमारी नदियों को लाल कर दोगे?
क्या तुम फिर चिनार की छाँव में नफ़रत भर लाओगे?
क्या तुम फिर मेरी आवाज़ छीन के मेरी आवाज़ बन जाओगे?
क्या तुम फिर हमारा बचपन क़ैद कर दोगे?
मैं लिखना चाहता हूँ, एक बार तुम्हारी आँखों में देख के
मैं तुम्हारी परछाई से भी घबराता हूँ
मुझे लगता है तुम्हे मेरी ज़ात से नफ़रत है
मुझे डर है की तुम ख़फ़ा ही रहोगे
मैं मर भी जाऊँ तो मेरे ख़याल से भी क्या ख़फ़ा रहोगे?
मुझे बतलाओ मैं क्या बन चला हूँ?

बहुत रोकता हूँ खुद को कुछ लिखने से
क्या लिखूं फिर वही सिलसिला जो बरसों से है देखा
पर अब लगता है ये सब बेमानी है
क्या ये लिखने से मुझे भी तुम आतंकवादी कहोगे?
मैं तुम्हारे लिए कोई नहीं हूँ 
मेरा वजूद भी तुम्हारे लिए बेमानी हो चुका है
आवाज़ों की इस जमघट में, मैं लिखना चाहता हूँ,
ऐसी ज़िन्दगी से अगर तुम्हे भी डर सा लगे
तो बेहसी ढलने से पहले तुम खुद को बचा लेना
पर अगर तुम्हे ये सब जायज़ लगे
तो मेरे डर को अपनी जीत का परचम बना लेना

पर मैं लिखना चाहता हूँ, ताकि एक बात कह सकूँ
मुझे तुम्हारे वादों और मन की बात से नहीं है मतलब
जो मन करे वो सब कुछ ले के जाओ
मैं तो बस एक बार फिर से रोना चाहता हूँ
ताकि खुद को ज़िंदा महसूस कर सकूँ
वो एहसास जाने मैं कब खो चला हूँ
मैं लिखना चाहता हूँ, मैं लिखना चाहता हूँ