250 से ज़्यादा लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का बयान: “जम्हूरियत का मज़ाक़”

सौजन्य Scroll.in: एक कश्मीरी महिला ईद के दिन दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान अपने आँसू पोछते हुए | अनुश्री फडणवीस / Reuters

जम्मू कश्मीर को मिले ख़ास दर्जे को हटा कर और उसे दो केंद्रशासित प्रदेशों में बाँट करकेंद्र सरकार ने लोकतंत्र का मज़ाक़ बना दिया है। उसने उन औपचारिक वादों को तोड़ दिया है जो भारत द्वारा 1947 में राज्य के पदारोहण के दौरान किये गए थे।

संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने और राज्य को दो हिस्सों में बाँट देने के इस क़दम को गुप्त रूप सेएकतरफ़ा रूप से और बलप्रयोग के साथ अंजाम दिया गया है। धार्मिकसांस्कृतिकसंजातीय और वैचारिक वर्गों के लोगों से इस बारे में कोई चर्चा नहीं की गई। अगस्त 2019 की शाम से राज्य में सुरक्षा और सूचना पर जो अभूतपूर्व स्तर का शिकंजा कसा गया हैउससे ये बात ज़ाहिर हो गई है कि सरकार असहमति और लोकतांत्रिक मतभेद से किस क़दर घबराई हुई है।

हमभारत के नागरिक जो लेखककलाकारमीडिया के सदस्य और सांस्कृतिक कार्यकर्त्ता हैंजम्मू कश्मीर में सरकार द्वारा उठाए गए इस ग़ैरलोकतांत्रिक और असंवैधानिक क़दम की निंदा करते हैं। हम अपनी बुनियादी संवैधानिक संघीयता का हनन करते हुए राज्य और जनता को बांटने के सरकार के इस फ़ैसले की निंदा करते हैं। हम सदियों से प्रताड़ना झेल रहे राज्य के लोगों पर लगाई गई इस घेराबंदी की निंदा करते हैं।

हम मांग करते हैं कि जम्मूकश्मीर से घेराबंदी हटाई जाए। और सभी बुनियादी आज़ादी – अभिव्यक्ति की आज़ादीसंचार और मीडिया की आज़ादी को तुरंत वापस किया जाये। हम 370 और जम्मूकश्मीर को राज्य का दर्जा वापस करने की मांग करते हैं। हम कश्मीरी अवाम के साथ अपनी एकजुटता ज़ाहिर करते हुए अपने साथी नागरिकों से मांग करते हैं कि वो आगे आएं और जम्मूकश्मीर के स्वराज्य और आज़ादी पर हो रहे इन सत्तावादी हमलों का विरोध करें।

इंडियन राइटर्स फ़ोरम के लिए 

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