• सिर्फ़ कश्मीर नहीं, यह समूचा देश तुम्हारा हो…

    आज कश्मीर के मसले पर और सरहद के तनाव पर हम आपके बीच दो महत्वपूर्ण कवितायें साझा कर रहे हैं।

    न्यूज़क्लिक टीम

    August 7, 2019

    कश्मीर के हालात ख़राब हैं, यूँ ख़राब हैं कि उनकी किसी को ख़बर ही नहीं है। देश भर में अनुच्छेद 370 को हटा देने के "साहसिक" क़दम का जश्न तो मनाया जा रहा है, लेकिन जिस कश्मीरी अवाम के नाम पर ये सब हो रहा है, उसकी किसी को सुध नहीं है।

    कविता के बारे में कहा जाता है कि जब सारी तदबीरें उल्टी हो जाती हैं, तब कविता ही दवा का काम करती है। आज, कश्मीर के मसले पर और सरहद के तनाव पर हम आपके बीच युवा कवि पराग पावन और विहाग वैभव की कवितायें साझा कर रहे हैं :

    सिर्फ़ कश्मीर नहीं

    सिर्फ़ कश्मीर नहीं
    यह समूचा देश तुम्हारा हो
    लेकिन क्या क़यामत है दोस्त!
    तुम्हारी देह इतनी छोटी है
    कि मात्र एक बिस्तर भर सो पाओगे
    तुम्हारी थकान अदद एक पेड़ की छाया में सिमट जाएगी
    तुम्हारी भूख दो आलू के मुक़ाबले भी बौनी है
    और सारी ज़िन्दगी चलकर भी
    तुम्हारी प्यास अपना ही कुँआ लाँघ नहीं पाएगी

    क्या आख़िरी आदमी के क़त्ल होने के बाद ही
    तुम समझ पाओगे
    कि तुम्हारे पास भी एक गर्दन है
    क्या आख़िरी आदमी के क़त्ल होने के बाद ही
    तुम महसूस कर पाओगे
    कि निर्जन धरती पर अकेले चीखते व्यक्ति की
    वह प्रार्थना भी अनसुनी रह जायेगी
    जिसमें मृत्यु की भीख माँगी जाती है

    जो धरती को जीतने निकले थे
    धरती उन्हें भी जीतकर चुपचाप सो रही है
    जहाँ तुम खड़े हो
    वहीं दबी किसी सिकन्दर की राख से
    मेरे कहे की तसदीक़ करो

    ये सरहदों के उलझे मसअले उनकी तलब हैं
    जो झरते हुए कनेर के उत्सव से
    बहुत दूर चले गए हैं
    और जिनके दिल के शब्दकोश से
    प्रेम और करुणा जैसे शब्द
    कब का विदा ले चुके हैं

    सिर्फ़ कश्मीर नहीं
    समूचे देश को अपनी जेब में रखकर घूमने वाले दोस्त!
    सरकारी जश्न से फ़ुर्सत मिले तब सोचकर बताना
    कि मामूली इंजेक्शन के अभाव में
    मर गए पिता की याद को
    किस ख़लीते में छुपाओगे?

    – पराग पावन
    (पराग जेएनयू के शोध छात्र हैं।) 

     

    चाय पर शत्रु-सैनिक

    उस शाम हमारे बीच किसी युद्ध का रिश्ता नहीं था

    मैंने उसे पुकार दिया-
    आओ भीतर चले आओ बेधड़क
    अपनी बंदूक और असलहे वहीं बाहर रख दो
    आस-पड़ोस के बच्चे खेलेंगें उससे
    यह बंदूकों के भविष्य के लिए अच्छा होगा

    वह एक बहादुर सैनिक की तरह
    मेरे सामने की कुर्सी पर आ बैठा
    और मेरे आग्रह पर होंठों को चाय का स्वाद भेंट किया

    मैंनें कहा-
    कहो कहाँ से शुरुआत करें?

    उसने एक गहरी साँस ली, जैसे वह बेहद थका हुआ हो
    और बोला- उसके बारे में कुछ बताओ

    मैंनें उसके चेहरे पर एक भय लटका हुआ पाया
    पर नज़रअंदाज़ किया और बोला-

    उसका नाम समसारा है
    उसकी बातें मज़बूत इरादों से भरी होती हैं
    उसकी आँखों में महान करुणा का अथाह जल छलकता रहता है
    जब भी मैं उसे देखता हूँ
    मुझे अपने पेशे से घृणा होने लगती है

    वह ज़िंदगी के हर लम्हे में इतनी मुलायम होती है कि
    जब भी धूप भरे छत पर वह निकल जाती है नंगे पाँव
    तो सूरज को गुदगुदी होने लगती है
    धूप खिलखिलाने लगता है
    वह दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत पत्नियों में से एक है

    मैंनें उससे पलट पूछा
    और तुम्हारी अपनी के बारे में कुछ बताओ…
    वह अचकचा सा गया और उदास भी हुआ
    उसने कुछ शब्दों को जोड़ने की कोशिश की-

    मैं उसका नाम नहीं लेना चाहता
    वह बेहद बेहूदा औरत है और बदचलन भी
    जीवन का दूसरा युद्ध जीतकर जब मैं घर लौटा था
    तब मैंनें पाया कि मैं उसे हार गया हूँ
    वह किसी अनजाने मर्द की बाहों में थी
    यह दृश्य देखकर मेरे जंग के घाव में अचानक दर्द उठने लगा
    मैं हारा हुआ और हताश महसूस करने लगा
    मेरी आत्मा किसी अदृश्य आग में झुलसने लगी
    युद्ध अचानक मुझे अच्छा लगने लगा था

    मैंनें उसके कंधे पर हाथ रखा और और बोला –
    नहीं मेरे दुश्मन, ऐसे तो ठीक नहीं है
    ऐसे तो वह बदचलन नहीं हो जाती
    जैसे तुम्हारे सैनिक होने के लिए युद्ध ज़रूरी है
    वैसे ही उसके स्त्री होने के लिए वह अनजाना लड़का

    उसने मेरे तर्क के आगे समर्पण कर दिया
    और किसी भारी दुख से सिर झुका लिया

    मैंनें विषय बदल दिया ताकि उसके सीने में
    जो एक ज़हरीली गोली अभी घुसी है
    उसका कोई काट मिले-

    मैं तो विकल्पहीनता की राह चलते यहाँ पहुँचा
    पर तुम सैनिक कैसे बने?
    क्या तुम बचपन से देशभक्त थे?

    वह इस मुलाक़ात में पहली बार हँसा
    मेरे इस देशभक्त वाले प्रश्न पर
    और स्मृतियों को टटोलते हुए बोला-

    मैं एक रोज़ भूख से बेहाल अपने शहर में भटक रहा था
    तभी उधर से कुछ सिपाही गुज़रे
    उन्होंने मुझे कुछ अच्छे खाने और पहनने का लालच दिया
    और अपने साथ उठा ले गए

    उन्होंने मुझे हत्या करने का प्रशिक्षण दिया
    हत्यारा बनाया
    हमला करने का प्रशिक्षण दिया
    आततायी बनाया
    उन्होनें बताया कि कैसे मैं तुम्हारे जैसे दुश्मनों का सिर
    उनके धड़ से उतार लूँ
    पर मेरा मन दया और करुणा से न भरने पाए

    उन्होंने मेरे चेहरे पर ख़ून पोत दिया
    कहा कि यही तुम्हारी आत्मा का रंग है
    मेरे कानों में हृदयविदारक चीख़ भर दी
    कहा कि यही तुम्हारे कर्तव्यों की आवाज़ है
    मेरी पुतलियों पर टाँग दिया लाशों से पटी युद्ध-भूमि
    और कहा कि यही तुम्हारी आँखों का आदर्श दृश्य है
    उन्होंने मुझे क्रूर होने में ही मेरे अस्तित्व की जानकारी दी

    यह सब कहते हुए वह लगभग रो रहा था
    आवाज़ में संयम लाते हुए उसने मुझसे पूछा-
    और तुम किसके लिए लड़ते हो?

    मैं इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं था
    पर ख़ुद को स्थिर और मज़बूत करते हुए कहा-

    हम दोनों अपने राजा की हवश के लिए लड़ते हैं
    हम लड़ते हैं क्यों कि हमें लड़ना ही सिखाया गया है
    हम लड़ते हैं कि लड़ना हमारा रोज़गार है

    उसने हल्की मुस्कान के साथ मेरी बात को पूरा किया-
    दुनिया का हर सैनिक इसी लिए लड़ता है मेरे भाई

    वह चाय के लिए शुक्रिया कहते हुए उठा
    और दरवाज़े का रुख किया
    उसे अपनी बंदूक का ख़याल न रहा
    या शायद वह जानबूझकर वहाँ छोड़ गया
    बच्चों के खिलौनों के लिए
    बंदूकों के भविष्य के लिए

    उसने आख़िरी बार मुड़कर देखा तब मैंनें कहा-
    मैं तुम्हें कल युद्ध में मार दूँगा
    वह मुस्कुराया और जवाब दिया-
    यही तो हमें सिखाया गया है।

    – विहाग वैभव
    (विहाग वैभव भी शोध छात्र हैं। उन्हें इसी कविता के लिए इस साल का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार देने की घोषणा की गई है।)


     

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