• झारखंड : फिर एक बार मॉबलिंचिंग का वार, आदिवासी हुए शिकार

    अनिल अंशुमन

    May 16, 2019

    आखिरकार राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को राज्य के गुमला ज़िला स्थित डुमरी प्रखण्ड के जुरमु गाँव के आदिवासियों पर हुए ‘ मॉबलिंचिंग   कांड ‘ पर संज्ञान लेकर 8 मई को झारखंड डीजीपी व ज़िला एसपी से 15 दिनों के अंदर जवाब मांग है । बीते 11 अप्रैल को तथाकथित गौ – रक्षकों की संगठित हत्यारी जमात ने मरे हुए बैल का मांस काट रहे आदिवासियों पर ‘ जय श्री राम और जय बजरंगबली ‘ का नारा लगाते हुए हमला बोल दिया । जिसमें चार आदिवासी गंभीर रूप से घायल हो गए जिसमें से एक की मौत हो गयी। इस सुनियोजित कांड पर संज्ञान लेकर दोषियों को सज़ा देने की मांग को लेकर  सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने आयोग में याचिका दायर की थी । आयोग के नोटिश दिये जाने पर भी प्रशासन का गंभीर नहीं होना यह दर्शाता है कि पिछले अन्य कांडों की तरह इस कांड के मुजरिमों को भी भाजपा शासन का संरक्षण मिला हुआ है । जबकि आसपास के स्थानीय लोगों व आदिवासियों में घटना को लेकर काफी आक्रोश है जो सिर्फ चुनावी माहौल के कारण फिलहाल दबा हुआ है ।

    उक्त कांड के शिकार जेनेरियस मिंज के अनुसार 11 अप्रैल को साप्ताहिक हाट(बाजार )का दिन था । उनके कहे अनुसार हमलोग ( प्रकाश लकड़ा , पीटर लकड़ा , बेलासियुस तिर्की व मैं )गाँव के ही एक आदिवासी के बैल की दुर्घटनावश मृत्यु हो जाने पर  गाँव की नदी किनारे उस बैल का मांस काटकर चमड़ा निकाल रहे थे । जिसे देखकर के जैरागी गाँव के साहूकार परिवार व कई अन्य लोगों के हथियारबंद समूह ने गौ हत्या का आरोप लगाकर हमलोगों पर हमला बोल दिया । हमारे बार बार कहते रहने के बाद भी कि हम गाय नहीं बल्कि मरे हुए बैल को काट रहे हैं , किसी ने एक नहीं सुनी और पीटने लगे । ये जानते हुए भी कि हम ईसाई समाज के हैं फिर भी हमलोगों से ‘ जय  श्रीराम और जय  बजरंगबली ‘ के नारे लगवाये गए और नहीं बोलने पर खूब पीटा गया । घंटों पीटने के बाद हमें घसीटकर अपने गाँव ले गए और वहाँ भी काफी पिटाई करके देर रात बस में लादकर डुमरी थाना के पास छोड़ आए । पिटाई से बुरी तरह घायल हुए प्रकाश लकड़ा की सांसें उस समय चल रहीं थी और यदि समय पर इलाज हो जाता तो वह नहीं मरता । सुबह में बाइक से दो हमलावर आए और थाना में कहा कि – चार गौकशी करनेवालों को पड़कर लाये हैं … तब पुलिसवाले आए और मृतक प्रकाश समेत हम सबों को अस्पताल ले गए । पुलिस ने डाक्टर से रिपोर्ट में प्रकाश लकड़ा को ज़िंदा लिखने को कहा लेकिन डाक्टर ने मना कर दिया । इस दौरान हमें देखने पँहुचे हमारे परिजनों को हमलोगों से नहीं मिलने दिया गया । पुलिस ने हमलावारों पर कोई कार्रवाई करने की बजाय स्थानीय चौकीदार के नाम से झूठा बयान दर्ज़ कर हम सबों पर गौ हत्या का मुकादमा कर दिया । सूचना है कि घायल आदिवासियों ओर से मुकदमा दर्ज किए जाने पर दो नामजद हमलावरों को गिरफ्तार करने की औपचारिकता हुई है । 

     इस जघन्य कांड की खबर प्रसारित करते हुए बीबीसी ने सत्ताधारी भाजपा समेत विपक्ष के राजनीतिक दलों व उनके नेताओं के वहाँ नहीं पहुँचने पर काफी हैरानी जताई  । साथ ही सवाल भी उठाया कि इस कांड समेत राज्य में गौ रक्षा व सांप्रदायिक हिंसा के नाम पर अबतक कई निर्दोषों की जानें लीं जा चुकी हैं तो इसे झारखंड में लोकसभा चुनाव 2019 का मुद्दा क्यों नहीं बनाया जा रहा ? जबकि बीजेपी खुलकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से राज्य में मुस्लिम – ईसाई व आदिवासियों को लिंचिंग का शिकार बना रही है । 
    ये  चिंता वाजिब है और इस संकट के समाधान हेतू विपक्ष और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाले राजनीतिक दलों के नेताओं से उनकी भूमिका को लेकर जवाब मांगा ही जाना चाहिए । क्योंकि इसके पूर्व में भी बालूमाथ कांड से लेकर रामगढ़ मॉबलिंचीग  कांड व सांप्रदायिक हिंसा की सरकार संरक्षित  दर्जनों घटनाएँ हो चुकी हैं । जिसके खिलाफ विपक्ष व सेक्युलर दलों के नेताओं के निंदा के बयान व औपचारिक विरोध कार्यक्रम तो हुए लेकिन जमीनी स्तर पर कोई बड़ा सामाजिक जनदबाव खड़ाकर दोषियों को सज़ा नहीं दिलाई जा सकी । 
    चर्चा यही है कि चुनाव के संवेदनशील माहौल में आम हिन्दू वोटरों की नाराजगी का खतरा कोई पार्टी नहीं मोल लेना चाहती । दूसरे , जिस प्रकार से रामगढ़ मॉबलिंचीग कांड के अभियुक्तों को फास्ट ट्रैक कोर्ट से सज़ा होने के पश्चात हाईकोर्ट से जमानत दिये जाने पर भाजपा के केंद्रीय मंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से अभिनन्दन  किया गया , इसने अपराध करनेवालों को बेलगाम बना दिया । 

    इसके अलावे तीसरा और सबसे चिंताजंक पहलू है , राज्य की आदिवासी व अन्य सामाजिक समुदायों के बढ़ते आपसी अलगाव की स्थिति का होना । जो अपराध करनेवालों को सामाजिक तौर पर रोकने में पूरी तरह असफल दिख रहा है । उदाहरण के तौर पर, जब बालूमाथ में मुस्लिमों के साथ मॉबलिंचिंग  कांड हुआ तो स्थानीय से लेकर राजधानी तक अधिकांश प्रमुख आदिवासी सामाजिक संगठन व कार्यकर्ता खामोश रहे । लेकिन वहीं जब इस बार गुमला में आदिवासियों के साथ मॉबलिंचिंग  कांड हुआ तो आदिवासी संगठन व सामाजिक कार्यकर्त्ता सड़कों पर उतरे तो मुस्लिम खामोश रहे । जाहिर है कि ऐसे में शासन – प्रशासन द्वार संरक्षित इन कांडों के खिलाफ कोई भी व्यापक और बड़े जन दबाव का खड़ा होना मुश्किल है ।

    हालांकि वामपंथी दल व संगठनों तथा व्यापक नज़रिये वाले कई सामाजिक संगठन व कार्यकर्त्ताओं के सामाजिक एकता आधारित विरोध खड़ा करने की कोशिशें जारी हैं । लेकिन विभाजनकारी व हत्यारी ताकतों के संगठित और सुनियोजित हमलों के खिलाफ अलग अलग सामुदायों में बंटकर विरोध कर रही सामाजिक ताकतों के वृहत एकीकरण कि चुनौती अब भी सबसे महत्वपूर्ण कार्य बना हुआ है । अन्यथा सुनियोजित हादसों को झेलते रहना सबकी नियति ही बनी रहेगी। 


     

    सौजन्य न्यूज़क्लिक.

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