• “जो संगीत हम बना रहे हैं, वो समाज से ही ले कर हमने समाज को दिया है”

    दानिया रहमान के साथ "मेरी ज़िन्दगी" बैंड की बातचीत

    May 10, 2019

    बैंड्स तो बहुत हैं, पर आज हम बात कर रहे हैं लखनऊ शहर के एक रॉक बैंड की, जिसमें केवल महिलाएं हैं। "मेरी ज़िन्दगी" कोई आम बैंड नहीं है, ये बॉलीवुड के गाने नहीं गाता, इस बैंड का एक मक़सद है और ये अपने गानों के ज़रिये से महिला सशक्तीकरण और अन्य सामाजिक मुद्दों के बारे में बात करता है। 2010 में डॉक्टर जया तिवारी द्वारा शुरू किये गए इस बैंड में फिलहाल पूर्वी मालवीय, निहारिका दुबे, महक प्रधान और सौभाग्य दिक्षित हैं।

    ये बैंड बस एक बैंड नहीं, एक परिवार है, जिसका हर सदस्य न सिर्फ़ एक दूसरे को समझता है, एक दूसरे से सीखता है, बल्कि हर एक महिला तक अपनी आवाज़ पहुंचा कर उन्हें भी बताना चाहता है कि वे कुछ भी कर सकती हैं। यह बैंड समाज को बताना चाहता है कि ये ज़िन्दगी, सबकी अपनी ज़िन्दगी है और सबको ये ज़िन्दगी अपने हिसाब से जीने का हक़ है।

    इंडियन कल्चरल फोरम की दानिया रहमान ने बैंड के सभी सदस्यों से बात करी और उनसे "मेरी ज़िन्दगी" के बारे में, संगीत और समाज के बारे में, और सबके अपने-अपने सफ़र और अनुभवों के बारे में जानने की कोशिश की। बातचीत से कुछ अंश:

    दानिया: एक ऑल-फ़ीमेल बैंड बनाने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली? बैंड का नाम "मेरी ज़िन्दगी" क्यों?

    जया तिवारी: "मेरी ज़िंदगी" भारत का पहला महिला रॉक बैंड है जिसका उद्देश्य है: "लड़कियों को बचाओ और लड़कियों को पढ़ाओ।" मैं इस महिला रॉक बैंड की संस्थापक हूँ और हमारा मिशन महिला सशक्तिकरण है। हम अपने गीतों से, अपने बोल से, सामाजिक मुद्दों को उठाने की कोशिश करते हैं। एक बैंड के रूप में दस साल का सफ़र रहा है हमारा अब तक।

    एक फ़ीमेल बैंड का हमारे आस-पास कोई कान्सेप्ट ही नहीं था। हमने नहीं देखा कि कोई ऐसा बैंड हो जिसमें केवल महिलाएँ ही हों। लखनऊ(यूपी) जैसी जगहों में मौक़े बहुत सीमित हैं, लोगों की सोच ज़्यादा ब्रॉड नहीं है। आस-पास के लोग ऐसे नहीं होते कि आपको ऊँची सोच दे पाएँ या आप कुछ नए आइडियाज़ क्रिएट कर पाएँ। आपको कुछ क्रिएट करने के लिए भी आपके आस-पास कुछ ऐसे रिसोर्सेज़ होने चाहिए, ऐसे लोग होने चाहिए।

    पहले बैंड का नाम “ज़िन्दगी” था फिर वो “मेरी ज़िन्दगी” हो गया। हमने बहुत छोटे स्तर पर शुरुआत की थी—एक गिटार और कुछ रसोई के बर्तन जैसे चिम्टा, ओखल, ये सारी चीज़ें, क्योंकि हमारे पास रिसोर्सेज़ या इंस्ट्रूमेंट्स नहीं थे। क्योंकि ये एक फ़ीमेल बैंड है, संगीत को ले कर सोसाइटी में या घर पर इतना बढ़ावा नहीं दिया जाता, वो प्रेरणा नहीं दी जाती। अगर मुझे दिया जाएगा तो भी ज़रूरी नहीं है कि मेरी बाक़ी बैंड मेंबर्स को भी इतनी आज़ादी मिलेगी। आप पढ़ सकते हो, इंजीनियर, डॉक्टर, कुछ भी बन सकते हो पर जब संगीत की बात आती है, तो अभी सोसाइटी इतना आगे नहीं बढ़ पायी है। इनको लगता है कि ये पैसे और वक़्त कि बर्बादी है। उन्हें लगता है कि ये उनकी गरिमा को अपमानित करता है।

    पर जो संगीत हम बना रहे हैं, वो सोसाइटी से ही ले कर हमने सोसाइटी को दिया है। मेरा मानना है कि अगर आपके अंदर कोई कमी है तो उसे बताने वाला कोई होना चाहिए लेकिन अगर ये कमियाँ सीधे बताई जाएँ तो लोग या तो रक्षात्मक हो जाते हैं या आक्रामक हो जाते हैं। वहीं अगर प्यार से, एक म्यूज़िकल अंदाज़ में लोगों को बताया जाए तो लोग सुनते हैं। मुझे लगा कि संगीत के ज़रिये से सोसाइटी को मैसेज देने से अच्छा कोई ज़रिया नहीं हो सकता, क्योंकि कॉन्फ़्रेंसेज़, डिबेट्स और न्यूज़ में कई बार ये मैसेज स्किप हो जाता है।

    बैंड का नाम "मेरी ज़िन्दगी" इसलिए, क्योंकि ये मेरी ज़िन्दगी, और क्योंकि हम एक फ़ीमेल-सेंट्रिक बैंड हैं तो जो भी गाने हैं, उनकी रचना, उनके बोल हैं, वो मेरे, आपके और हर एक औरत की ज़िन्दगी के बहुत क़रीब हैं। आप कोई भी गाना सुनेंगे तो लगेगा कि अगर मेरे साथ नहीं जुड़ा है तो मेरी बगल वाली उस लड़की के साथ ज़रूर जुड़ा है। जैसे ही आप इस बैंड से जुड़ते हैं तो वो आपकी ज़िन्दगी हो जाती है, "मेरी ज़िन्दगी" हो जाती है।

    दानिया: इस बैंड के सदस्य बनने का आप सब का सफ़र कैसा रहा है, किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और अब आप सब ख़ुद को कहाँ देखते हैं एक बैंड के रूप में?

    पूर्वी मालवीय: मैं "मेरी ज़िन्दगी" महिला बैंड में गिटार बजाती हूँ और चार साल से इस बैंड का हिस्सा हूँ। मैं लखनऊ से हूँ और मुझे हमेशा से संगीत में दिलचस्पी रही है। मेरे माता-पिता दोनों को संगीत में काफ़ी रुचि थी और आप कह सकते हैं कि मुझे उनसे संगीत विरासत में मिला है। हालांकि मेरे माता-पिता ने हमेशा मेरा समर्थन किया है और मुझे जो मैंने चाहा वह करने दिया है, फिर भी मैंने अपने आस-पास देखा है कि महिलाओं के लिए ज़्यादा अवसर नहीं हैं। इन दिनों लोग सोचते हैं कि लड़कियाँ पढ़ाई में अच्छी हैं तो उन्हें पढ़ने दिया जाता है, लेकिन एक बैंड में संगीतकार के रूप में उनके बारे में सोचना, वह भी एक रॉक बैंड, ये उनके लिए मुश्किल है।

    मैं जया मैम से मिली, उन्होंने मेरा ऑडिशन लिया और "मेरी ज़िन्दगी" के सदस्य के रूप में मेरे सफ़र की शुरुआत हुई। मैं हमेशा सोचती थी कि लड़कियों को भी मौक़े मिलने चाहिए, सिर्फ़ लड़की होने की वजह से मौक़े नहीं मिलना ग़लत है और इस बैंड में आ कर मेरी इस सोच को आवाज़ मिली। बेशक, कठिनाइयाँ हैं पर संगीत एक ऐसा माध्यम है जिससे लोग आसानी से जुड़ जाते हैं।

    मुझे अपने सफ़र में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा- मुझे अपनी पढ़ाई का प्रबंधन करना था, घर की देखभाल करनी थी, और रिहर्सल के लिए भी समय निकालना पड़ता था। मैंने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का भी सामना किया है। कई बार ऐसे दिन आये हैं जब मेरी परीक्षाएँ, घर पर कुछ ज़रूरी काम, और बैंड का प्रदर्शन, सब एक ही दिन होता और मुझे सब कुछ संभालने में सक्षम होने के लिए सुबह से शाम तक भाग दौड़ करनी पड़ती। हालांकि पुरुषों की अपनी कठिनाइयाँ हो सकती हैं, पर एक महिला संगीतकार होना निश्चित रूप से ज़्यादा मुश्किल है।

    निहारिका दुबे: मैं "मेरी ज़िन्दगी" बैंड की सिंथेसाइज़र प्लेयर हूँ। मैं इस बैंड से काफ़ी लम्बे समय से जुड़ी हुई हूँ। बहुत सारे ऐसे अनुभव रहे हैं जो चेहरे पी ख़ुशी दे जाते हैं। मैं सबसे पहले बैंड में घुंगरू बजाया करती थी, उसके बाद मैंने किचन का एक इन्स्ट्रुमेंट उठाया जिसका नाम चिमटा है। चिमटे से एक खनक भी निकलती थी और साथ ही नारी शक्ति का भी कहीं न कहीं एक प्रतीक है चिमटा। कहते हैं न कि खाना तभी पूरा होता है जब हम रोटी सेकते हैं, वैसे ही जब चिमटा बजता था, तब हमारे गाने में और भी शक्ति आ जाती थी।

    अब मैं सिंथेसाइज़र प्ले करती हूँ। अगर अनुभव की बात करें, जो जब भी मैं अपने इस सफ़र के बारे में सोचती हूँ, मुझे बहुत गर्व महसूस होता है कि हम एक महिला बैंड का हिस्सा हैं। ये अपने आप में बहुत बड़ी उप्लभ्धि है।

    शनिवार और रविवार हमारे लिए बहुत मज़ेदार होता है। मैं नौकरी करती हूँ, जया मैम नौकरी करती हैं, और बाक़ी मेंबर्स बाहर रहते हैं, तो इन्हीं दो दिनों में हम ज़रूर मिलते हैं, जैम करते हैं। जब भी कोई नया गाना निकल कर आता है, हर बार का अनुभव बहुत ही जानदार-शानदार होता है। कोई भी गाना जब हम जगह-जगह परफ़ॉर्म करते हैं, तो जो रिस्पोंस हमें मिलता है वो हमारे अंदर फिर से एक जोश भर देता है, चाहे वो मध्य प्रदेश हो या दिल्ली।

    हमें और हमारे परिवार को इस बात का गर्व है कि हम एक ऐसे बैंड से जुड़े हुए हैं जो सोसाइटी के लिए, महिलाओं के लिए, बच्चियों के लिए काम कर रहा है, उन्हें पढ़ा रहा है। इस बैंड से जुड़े होने की वजह से हम समाज की और अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा कर पा रहे हैं।

    हाल ही में एक नया अनुभव हुआ है इन्स्ट्रुमेंट बनाने का। हमने कांच की बोतलों में अलग-अलग मसाले भरे हैं, और जिनकी अलग-अलग आवाज़ें हमारे गानों को एक नया रूप देगी। हमने एक स्टैंड भी बनाया है बोतलों को रखने के लिए और मुझे उम्मीद है कि जब भी आप "मेरी ज़िन्दगी" को परफॉर्म करते देखेंगे तो हमारे इस नए इन्स्ट्रुमेंट का ज़रूर आनंद उठाएंगे।

    अगर कठिनाइयों की बात की जाए तो मेरे परिवार ने हमेशा मेरा साथ दिया है पर कई लोग ताने भी मारते थे कि "अच्छा बैंड में जा रही हो, बैंड बजाने जा रही हो, फिर नौकरी कैसे करोगी?", कभी-कभी ऐसा लगता था कि अब नहीं हो पाएगा कुछ पर इस बैंड में न जाने कैसी शक्ति है जो हर बार अपनी ओर खींच लेती है।

    एक महिला होने के नाते मैंने कई कठिनाइयों का सामना किया है। मैं बहुत दूर से आती हूँ, जब भी हम रास्ते पे चलते हैं, या ऑटो में जाते हैं, हमें बहुत सी चीज़ों से जूझना पड़ता है। मैंने जया मैम को एक बार बताया कि कैसे लड़के ऑटो में बदतमीज़ी करते हैं, रोज़-रोज़ कैसे कोई झगड़ा करे इनसे, आप इसपे कुछ गाना लिखो। तो हमारा गाना "टेम्पो रिज़्का" आया। "टेम्पो रिज़्का में बैठे जो लोग, कोई नहीं आँखों पे इनके न टोक!" ऐसे गानों से इस बैंड ने हमें शक्ति दी है कि हम अपनी बात बोल सकें और अपने दर्शकों को भी हिम्मत दे सकें।

    महक प्रधान: मैं एम.एन.आई.टी. इलाहाबाद से एम.सी.ऐ. कर रही हूँ और इस बैंड से दो साल से जुड़ी हुई हूँ। मुझे इलाहाबाद में पूर्वी मालवीय मिली, जिन्होंने मुझे “मेरी ज़िन्दगी” बैंड और उसके मक़सद के बारे में बताया।

    हम बचपन से अपने आस-पास देखते आ रहे थे लड़कियों की स्तिथि, न सिर्फ़ भारत में बल्कि हर जगह, तो जब मुझे पूर्वी ने बैंड के बारे में बताया तो ऐसा लगा की जया मैम ने हमें इस बैंड के ज़रिये, अपने गानों के ज़रिये, अपने एहसास, अपनी भावनाओं को लोगों तक पहुँचाने का मौक़ा दिया है। हालांकि मैंने कभी किसी मुश्किल का सामना नहीं किया है क्योंकि मुझे मेरे मन की करने की आज़ादी मिली है मगर मैंने अपने आस-पास, अपने दोस्तों में देखा है कि उन्हें बहुत रुकावटों का सामना करना पड़ता है केवल इसलिए कि वे लड़कियाँ हैं।

    लड़कियों को अपनी आवाज़ दबाने की आदत होती है पर इस बैंड ने हमें हमारी आवाज़ उठाने का मौक़ा और साहस दिया है। और ये आवाज़, ये शब्द, ये भावनाएँ सिर्फ़ मेरी या इस बैंड की नहीं हैं, हम अपने गानों के ज़रिये हर एक महिला की बात कर रहे हैं, और उन्हें बता रहे हैं कि वो भी हर वो चीज़ कर सकती हैं जो वो चाहती हैं।

    सौभाग्य दिक्षित: मैं “मेरी ज़िन्दगी” बैंड में गायक हूँ और ओखल बजाती हूँ। संगीत में हमेशा से मेरी बहुत ही ज़्यादा रुचि रही है और मैं हमेशा से संगीत के ज़रिये कुछ बड़ा करना चाहती थी। जब "मेरी ज़िन्दगी" बैंड के ज़रिये मुझे वो अवसर मिला, तो मैंने ज़रा भी वक़्त नहीं लगाया सोचने में और बैंड का हिस्सा बन गयी। इस बैंड के सब लोग अपने आप में बहुत गुणवान हैं, सबमें एक एक्स फ़ैक्टर है।

    एक संगीतकार के रूप में मैं संगीत के साथ जो कुछ भी करना चाहती थी, उसका कम से कम 50-60% इस बैंड के साथ पूरा हो गया है। मैंने इस बैंड के माध्यम से बहुत कुछ सीखा है। मैं हमेशा से संगीत के बारे में अधिक से अधिक सीखना चाहती थी लेकिन वित्तीय बाधाओं या पारिवारिक समस्याओं और अन्य मुद्दों के कारण मैं बहुत कुछ नहीं कर पा रही थी। लेकिन इस बैंड का हिस्सा बनने के बाद, मेरा न केवल एक संगीतकार के रूप में बल्कि एक व्यक्ति के रूप में भी विकास हुआ है। मैं अपने साथ सहयोग करने के लिए बैंड के सभी सदस्यों का शुक्रगुज़ार हूँ क्योंकि उनके बिना यह संभव नहीं होता।

    हम कभी नहीं सुनते हैं कि कोई फ़ीमेल रॉक बैंड है। जब रॉक बैंड की बात आती है तो लड़कों की छवि ही दिमाग में आती है कि हाँ कुछ लड़कों का बैंड होगा जिनमें कुछ गिटारिस्ट होंगे जो सर हिला कर बजा रहे होंगे, उनके लम्बे-लम्बे बाल होंगे। मगर फ़ीमेल रॉक बैंड जैसा कोई कोंसेप्ट था ही नहीं और हमारे बैंड ने "रॉक बैंड्स" की एक नयी छवि बनाई है। हम कहीं भी जाते हैं तो एक अलग तरीक़े की स्वीकृति मिलती है क्योंकि शायद ही लोगों ने पहले कभी कोई ऐसा बैंड देखा होगा जो चीखने चिल्लाने के बजाय एक मक़सद के तहत गाने बनाता है, और समाज को कोई सन्देश देना चाहता है।

    भले ही लोग मुझसे आज भी कहते हैं कि ये गाना बजाना तुम्हें कहाँ तक ही ले जाएगा, मुझे पता है कि हमारे बैंड को हमने कहाँ से कहाँ तक पहुँचाया है। एक छोटे से शहर से निकल कर हमने राष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम बनाया है और उम्मीद है कि आगे अंतर्राष्टीय स्तर पर भी जाएंगे।

    जया तिवारी: संगीत की बहुत अलग ही एक दुनिया है उसके लिए लोग भी अलग दिमाग़ के होते हैं, उनकी पर्सनालिटी उनकी सोच काफ़ी अलग होती है। हमारे बचपन से ही, ख़ास कर के भारत में, यूपी में, और जैसे-जैसे और माइक्रो लेवल पर चले जाते हैं हमारी सोच छोटी होती जाती है क्योंकि हमको संगीत में पैसा नहीं दिख रहा होता। संगीत को या तो बड़े लोगों का शौक मानते हैं, या तो बहुत ही नीचे स्तर पर देखा जाता है।

    तो मिडिल क्लास परिवार से होना, संगीत को चुनना और उसके बाद इन बच्चियों को प्रोत्साहित करना एक बड़ा काम था। बैंड को आज लोग जानने लगे हैं लेकिन जब हमने शुरुआत की थी, किसी को बोलते थे फ़ीमेल बैंड है तो लोग सोचते थे कि अच्छा होंगे कोई मण्डली वाले। लोगों का एक्सेप्टेन्स बहुत बाद में आया और अभी भी नहीं है। अगर महिलाएँ गा रहीं हैं तो लोगों के दिमाग़ में एक ग्लैमर की छवि होती है कि “ग्लैमर” खड़ा होगा और हमारा मनोरंजन करेगा। हमें भी ग्लैमर पसंद है, पर मनोरंजन के कई तरीक़े होते हैं। हमारे बैंड में सादगी भी है, संदेश भी है, और इसमें एक गर्व की भावना भी है क्योंकि अगर आप ख़ुद में ही आश्वस्त नहीं हैं तो लोग आपको गंभीरता से नहीं लेते हैं।

    जब आप बैंड के सभी सदस्यों से बात करेंगे तो आपको महसूस होगा कि इनके लिए ये बैंड क्या है, उसका क्या महत्त्व है। हम इसी सम्मान के साथ अपने बैंड को स्टेज पर ले कर जाते हैं और वही सम्मान हमें मिलता है।

    ये एक पूरा समाज है, दस तरह के लोग हैं, दस तरह की विचारधाराएँ। बहुत से लोग बस मनोरंजन के लिए बुलाते हैं, पर हमने लोगों को वो छवि कभी बनाने नहीं दी। हम बॉलीवुड के गाने, वो ग्लैमर, वो फ़ैशन सब दिखा सकते हैं पर वो हमारा मक़सद नहीं है। नाम, शोहरत सब कुछ है पर वहाँ हमें संतुष्टि नहीं मिलती।

    हमारा लक्ष्य है कि हम एक ऐसा बैंड बनें कि जब भी कोई महिला, कोई लड़की एक बैंड शुरू करना चाहे तो उसके लिए बैंड का मतलब सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक ऐसा ज़रिया हो जिससे समाज की समस्याओं के बारे में बात की जा सके। हम एक ऐसा उदाहरण देना चाहते हैं जिससे कि महिलाएँ गर्व के साथ बैंड बना सकें, संगीत का आनंद उठा सकें, उसे अपना व्यवसाय बना सकें, अपनी ज़िन्दगी का हिस्सा बना सकें।

    दानिया: अपने गीतों के माध्यम से ये बैंड महिला सशक्तिकरण और अन्य सामाजिक मुद्दों के बारे में जागरुकता फैलाना चाहता है। क्या आपने अपने दर्शकों के दृष्टिकोण में, आपके गाने सुनने के बाद कोई बदलाव महसूस किया है?

    जया तिवारी: बैंड ने अब तक सौ-सवा सौ गाने लिखे हैं। हर गाना एक दूसरे से बड़ा ही अलग है, इनमें मुद्दों को उठाया है और साथ ही साथ ये भी बताया है कि उन्हें कैसे संभालना है।

    हम कैंपेन्स भी चलाते हैं, जैसे नवरात्री पर हमने "माँ की" कैंपेन शुरू किया था। घर पे और बाक़ी लोग भी हमें कहते थे कि अच्छा लग रहा है क्या कि नवरात्री जैसे अवसर पर #माँकी चला दिया है। तो हमने कहा कि आपने “माँ की” को गाली बनाया ही क्यों कि मुझे बुरा लगे या मुझे सोचना पड़े, आपको सोचना चाहिए था। इन सबके बावजूद, इस कैम्पेन से बहुत ज़्यादा बदलाव आया। अब हम पूरी दुनिया में एक साथ कोई बदलाव नहीं ला सकते हैं, मैं जहाँ पे हूँ, वहाँ पे अगर 30-40 लोग बदल रहे हैं तो मतलब शुरुआत हो चुकी है।

    "ना मानो", "ख़ुद से ख़ुद की हार को", और अभी एक नया गीत आया है "बैंड की कहानी", हमारे सभी गानों का एक उद्देश्य होता है। जैसे आप भी हमारा इंटरव्यू इसलिए ले रहीं हैं कि आप चाहती हैं कि हमारे बैंड के बारे में आप औरों को बताएँ, वही चीज़ है। हमें पता है कि गानों से बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं आएगा, लेकिन लोगों तक एक विचारधारा जाएगी। जैसा की सौभाग्या ने बोला कि उसका व्यक्तिगत विकास हुआ है बैंड में आ कर, मैं और मेरे जो भी बच्चे आए हैं, मैं ये पूर्ण विश्वास से बोल सकती हूँ कि ज़िन्दगी के किसी भी पड़ाव पर, किसी भी मुसीबत में मेरे बैंड के बच्चे ख़ुद को संभाल लेंगे।


    गाना: "न मानो"

    अगर हम चार घंटे अभ्यास करने बैठते हैं तो उसमें कम से कम एक घंटा आपस में चर्चा करते हैं। सिर्फ़ गाना गा देना हमारे बैंड का उद्देश्य नहीं है, हमने कुछ लड़कियों को चुना हुआ है, उनकी शिक्षा बैंड द्वारा प्रायोजित है, हम ऐसे छोटे-छोटे कई काम कर रहे हैं, सबको अलग अलग ज़िम्मेदारियाँ दी गयी हैं। अगर हम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सोच रहे हैं, तो वो भी इसलिए कि हम सिर्फ़ गा नहीं रहे हैं, पर एक मक़सद से गा रहे हैं। भीड़ से अलग चलने पर धीरे-धीरे अपनी एक पहचान बन ही जाती है।

    दानिया: बैंड के कुछ सदस्य आगे की पढ़ाई करने या किसी और कारणवश अन्य शहरों में चले गए हैं, ऐसे में बैंड प्रदर्शन या पूर्वाभ्यास कैसे कर पाता है?

    जया तिवारी: “मेरी ज़िन्दगी” एक बहुत बड़ा परिवार बन गया है। लगभग 30-32 लोग बैंड से इन दस सालों में जुड़े हैं, आए और गए हैं। क्योंकि समाज ने अपने नियम बना रखे हैं, लड़की है तो पढ़ेगी, फिर शादी होगी और वही घर से जाएगी, अभी तक ऐसी कोई परंपरा ही नहीं बनी कि लड़का आए और लड़की ना जाए। तो बैंड के कई मेंबर्स की शादी हो गयी, पढ़ाई या नौकरी के लिए विदेश या दूसरे शहर चले गए, पर सब आज भी हमसे जुड़े हुए हैं, हमें प्रोत्साहन देते हैं, कहते हैं कि मौक़ा मिलेगा तो दोबारा हम से आ के जुड़ेंगे, ऐसे ही हमारा परिवार बढ़ता गया। अभ्यास करते समय कई बार मुश्किलें होती हैं, पर हम उन परेशानियों के बारे में बातें नहीं करना चाहते, हम एक सकारात्मक माहौल चाहते हैं।

    मैं चाहती हूँ हमारा गीत, हमारे आर्टिकल्स, जो कुछ भी हो उससे लोग हमारे बारे में जानें या सुनें, वो देखें कि बस हम आगे बढ़ रहे हैं क्योंकि घटनाएँ तो होती हैं, पर हर एक चीज़ ज़रूरी है और उन्हीं अनुभवों से हम सीखते और आगे बढ़ते हैं।

    हम सुबह तीन बजे से पार्कों में बैठ कर अभ्यास करते थे, क्योंकि लड़कियों को कहा जाता है कि हम तो साथ नहीं देंगे, तुम्हें जैसे करना है करो, हमारा साथ यही है कि हमने रोका नहीं करने से। जैमिंग के बाद किसी को कॉलेज, किसी को नौकरी के लिए भागना पड़ता था। बहुत कुछ रहा है इस सफ़र में, हम रोये भी हैं, परफ़ोर्मेंस  के बाद, कई बार कोई शो हाथ से निकल जाने पर, मगर हर एक चीज़ ने बहुत कुछ सिखाया है।

    मैं धन्यवाद करती हूँ उन लोगों को जिन्होंने साथ दिया है, पर और भी ज़्यादा उनका धन्यवाद करती हूँ जिन्होंने साथ नहीं दिया, क्योंकि उनके कारण ही हम यहाँ तक पहुँच पाए हैं। उन्होंने साथ दिया होता तो सफ़र आसान हो जाता। मुश्किलों से ही प्रेरणा मिलती है, जब-जब कोई शॉक मिला है तब-तब मैंने किक दिया है, नए गाने लिखे हैं, शोज़ किये हैं।


    गाना: "माई लाइफ़ माई रूल्स"


     

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