• “शैक्षणिक संस्थानों को आज धीरे-धीरे ध्वस्त किया जा रहा है”

    मशहूर इतिहासकार रोमिला थापर का वरिष्ठ पत्रकार करन थापर के साथ इंटरव्यू

    April 28, 2019

    करण थापर:   प्रोफ़ेसर थापर, हम मोदी सरकार के 5 सालों से अपनी बात शुरू करते हैं। मैं आपसे पूछना चाहता हूँ 5 साल बीतने के बाद, आपकी नज़र में इस सरकार का कुल प्रभाव, कुल मूल्यांकन क्या रहा है?

    रोमिला थापर:  मैं अपनी बात थोड़ा और पहले से शुरू करना चाहती हूँ। और मेरे हिसाब से ये एक बेहद महत्वपूर्ण चुनाव हैं। मैं जानती हूँ कि यही बात हर चुनाव के बारे में बोली जाती है, लेकिन मेरे हिसाब से दो, या कहें तीन चुनाव महत्वपूर्ण रहे हैं। पहला सबसे महत्वपूर्ण था हमारा पहला चुनाव, जब हमने लोकतंत्र की स्थापना की थी, दूसरा था 1977 का चुनाव, जब हिंदुस्तान के लोगों ने एक तानाशाही ताक़त को सत्ता से बाहर किया था और मुझे लगता है ये चुनाव भी उतना ही ज़रूरी है, क्योंकि जो स्थिति हमारे सामने आज है, वो पिछले पाँच सालों में जो हुआ है, उसी का हासिल है। अंततः आने वाले समय में हमें दो सरकारों पे बीच चयन करना होगा- एक हिन्दू राष्ट्र सरकार और एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक सरकार के बीच। मुझे लगता है कि पसंद अब स्पष्ट रूप से साफ़ हो रही है, जिसकी वजह से ये चुनाव बेहद ज़रूरी हैं। और ये पसंद पिछले पाँच सालों में जो हुआ है, उसी की वजह से बनी है।

    करण थापर: आप इन पाँच सालों को कैसे देखती हैं?

    रोमिला थापर: मैं इन पाँच सालों को घटनाओं के 3 अलग अलग बिन्दुओं में बाँट कर देखती हूँ। ज़ाहिर तौर पर इसमें पहला बिन्दु है- आर्थिक प्रोग्राम, जिसमें हमने नोटबंदी देखी, किसानों की दुनिया की सारी मुश्किलें देखीं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और बेरोज़गारी जो कि बेहद ज़रूरी है। मुझे लगता है कि ये योजना कुछ मायनों में जनता के बीच सबसे सक्रिय थी, और इसी का आज बड़े पैमाने पर बेहद सही तरीक़े से विरोध हो रहा है। इन मुद्दों के लेकर वादे किए गए, जो कभी पूरे नहीं हुए। इस क्षेत्र को मैं एक विफ़लता  के रूप में देखती हूँ। आर्थिक वादे पूरे नहीं किए गए। और दिलचस्प बात ये है, कि वो अपने भाषणों में कभी-कभी ही इन योजनाओं के बारे में बात करते हैं। वो बाक़ी हर चीज़ पर बात करते हैं, निजी हमले करते हैं, बीजेपी-कांग्रेस और अन्य पार्टियों के बीच तू-तू मैं-मैं चलती रहती है, लेकिन इन योजनाओं की बात नहीं होती।

    दूसरा बिन्दु है- हिन्दुत्व प्रोग्राम और 'हिन्दू राष्ट्र' की तरफ़ सीधे तौर पर आई तेज़ी। इसमें मैं कुछ विफ़ल गतिविधियों को जोड़ती हूँ। जैसे घरवापसी, लव जिहाद जो एक पड़ाव तक पहुँचे लेकिन ज़ाहिर है कि उसके आगे नहीं जा पाए। मतलब आप किसी को ज़बरदस्ती हिन्दू धर्म में तो ला सकते हैं, लेकिन उसकी जाति का क्या? जाति के साथ तो हम पैदा होते हैं, तो ये एक मुश्किल है। लेकिन गोरक्षा प्रोग्राम में वो सबसे ख़तरनाक आतंक फैलाने में सफ़ल हुए हैं, जहाँ बीफ़ खाने और बेचने जैसे मुद्दे सामने लाए गए। और वो अल्पसंख्यकों को पराया करने में सफ़ल हुए हैं।

    और तीसरा बिन्दु है बोलने की स्वतंत्रता पर हमला, जिस पर ज़्यादा चर्चा नहीं होती है लेकिन मेरे जैसे लोगों के लिए ये बेहद अहम मुद्दा है। इसके तहत आम लोगों, वकीलों, कवियों, लेखकों को हिरासत में लिया गया है, उन पर एक्टिविस्ट होने के इलज़ाम लगाए हैं और बग़ैर किसी सुनवाई के, बिना किसी सबूत के उन्हें जेल में डाला गया है।

    करण थापर: मैं आपके सामने दो क्षेत्रों की बात रख रहा हूँ जिसमें कि मोदी सरकार को लगता है कि उन्होंने बेहद अच्छा प्रदर्शन किया है। पहला, मोदीजी को लगता है कि उन्होंने एक "स्वच्छ"(अभ्रष्ट) सरकार क़ायम की है। ज़ाहिर बात है कि मोदीजी के सरकार में हमने 2जी, कोलगेट, अगस्ता वेस्टलेंड या कॉमनवेल्थ जैसे घोटाले नहीं देखे हैं। क्या ये सरकार पिछली सरकार से ज़्यादा साफ़ रही है?

    रोमिला थापर: ये कहना मुश्किल है, क्योंकि इन घोटालों के साथ ये दिक़्क़त है कि अचानक से कुछ सामने आता है और सब कुछ उलट-पलट कर देता है, और जिसे आप साफ़ समझते रहते हैं, वो उतना साफ़ नहीं रह जाता। लेकिन सरकार अभ्रष्ट है या नहीं, इस पर मैं ये कहना चाहती हूँ कि बहुत बड़ा दावा ये था कि नोटबंदी से भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है। और ये बहुत बड़ा दावा था, क्योंकि भ्रष्टाचार तो कॉर्पोरेट, बड़े नेताओं के बीच हमेशा से चला आ रहा है, और शायद हमेशा चलता ही रहेगा। मेरी चिंता ये है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का जो भ्रष्टाचार है, वो कम बिल्कुल नहीं हुआ है, बल्कि बढ़ा ही है। इसका मतलब ये है, पुलिस थानों में, सरकारी कार्यालयों में, रोज़मर्रा के कामों में अगर आपको कोई टिकट, कूपन, आई-कार्ड, कुछ भी चाहिए तो आपको अतिरिक्त पैसा देना पड़ता है। जहाँ तक आम आदमी की बात है, तो भ्रष्टाचार बदतर ही हुआ है।

    करण थापर: दूसरी दावा जो मोदीजी ने सत्ता में आने पर किया था, वो ये था कि वो एक मजबूत और निर्णयात्मक नेत्रत्व स्थापित करेंगे। पाँच साल बाद , क्या वो उतने ही मज़बूत और निर्णायक साबित हुए हैं? या फिर वो आधिकारिक, यहाँ तक कि एकतंत्रीय साबित हुए हैं?

    रोमिला थापर: मुझे लगता है कि वो उन ज़रूरी बातों को भूल गए हैं कि एक अच्छी सरकार को क्या करना चाहिए। और उनका सारा ध्यान इस पर है कि पब्लिसिटी किस चीज़ से मिल सकती है। मुझे लगता है कि वो एक सेल्फ़ पब्लिसिस्ट(स्व-प्रचारक) हैं, जो कि एक हद तक सारे नेता हैं क्योंकि सबको जनता से संवाद करना होता है, लेकिन सवाल ये है कि आप इसे किस दर्जे तक ले जाते हैं। एक सरल सा सवाल ये उठता है कि हमारे पास एक स्पष्ट विदेश-नीति है? हमारे पास उनकी(मोदीजी) की तमाम तस्वीरें हैं जिसमें वो दुनिया भर के देशों को प्रधानमंत्रियों-राष्ट्रपतियों को गले लगाते रहते हैं। लेकिन नीतियों के तौर पर, और सारे देशों की नीतियों समझने के आधार पर इसका क्या फ़ायदा हुआ है?

    करण थापर: क्या आप ये कह रही हैं कि उनकी जो विदेश-नीति है वो महत्वपूर्ण तरीक़े से मुद्दों को समझने के लिए नहीं बल्कि स्व-प्रचार के लिए है?

    रोमिला थापर: जी मैं ऐसा मानती हूँ।

    करण थापर: हम अब उस मुद्दे पर आते हैं जिसमें आपको प्रामाणिक जानकारी है- मोदी सरकार का भारत की शिक्षा पर असर!

    मैं आपसे पहले पुछना चाहता हूँ कि इस बात की लोगों को बहुत चिंता रहती है कि मोदी सरकार ने किस तरह से शैक्षणिक संस्थानों जैसे जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, या संस्थानों जैसे इंडियन काउंसिल फ़ोर हिस्टोरिकल रिसर्च या इंडियन काउंसिल फ़ोर सोशल साइन्स रिसर्च के साथ जिस तरह का बर्ताव किया है। क्या आपके लिए भी ये चिंता का विषय है?  

    रोमिला थापर: जी बिल्कुल। और मेरी चिंताएँ शायद इससे भी बड़ी हैं। मैंने अपने सामने संस्थानों को बनते हुए देखा है। और मैंने लोगों को ऊर्जा, प्रतिबद्धता और प्यास लगाते हुए देखा है जिनको आज धीरे-धीरे ध्वस्त किया जा रहा है। लेकिन मैं थोड़ा पीछे जा कर ख़ुद से या आपसे ये सवाल पूछती हूँ कि ऐसा क्यों हो रहा है? वो शिक्षा के संस्थानों को ध्वस्त क्यों कर रहे हैं और वो शिक्षा के कामों में दख़ल क्यों दे रहे हैं? मुझे लगता है बीजेपी-आरएसएस के अंतिम लक्ष्य, इस देश को हिन्दू-राष्ट्र बनाने से जुड़ा हुआ है। और ये बात उन्होंने हमेशा से काफ़ी खुलकर कही भी है, कि इस देश को आख़िरकार एक हिन्दू राष्ट्र बनाना है। मैं अब ये बताना चाहती हूँ कि मैं हिन्दू राष्ट्र को कैसे देखती हूँ, इससे ये बात भी पता चल जाएगी कि मुझे इतनी चिंता क्यों है।

    ये सिद्धांत सबसे पहले 1930 में वजूद में आया था। इसकी जड़ें दो चीज़ों में है। एक है भारत की कोलोनियल समझ, जो कि जेम्स मिल की 1818 में लिखी किताब से आता है, जिसमें वो भारतीय इतिहास को हिन्दू, मुस्लिम और अंग्रेज़ों में बाँटते हैं। जिसमें उन्होंने ये भी कहा है कि भारत हमेशा से दो देशों में बंटा रहा है- हिन्द और मुस्लिम, जो हमेशा एक दूसरे से लड़ते आए हैं। तो जो दो देशों का सिद्धांत है, वो वहाँ से शुरू होता है, और यही दो देशों का सिद्धांत हिन्दू राष्ट्र की नींव है।

    और आरएसएस पर जो दूसरा बड़ा असर था, वो थे यूरोपी फ़ासीवाद के साथ उनका रिश्ता और उनके नेताओं ने इस बारे में लिखा भी था कि वो मुसोलिनी से बेहद प्रभावित थे और वो आरएसएस को भी उसी विचारधारा के तहत बना रहे थे। शायद उसी की वजह से आरएसएस इतना सु-आयोजित और अनुशासन प्रिय है।

    करण थापर: इसी संदर्भ में, आप उन बदलावों को कैसे देखती हैं जो स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में किए जा रहे हैं? हालांकि ये मुद्दा प्रेस में उठाया गया है लेकिन आप जैसे शिक्षाविदों के लिए ये चिंता का विषय क्यों है?

    रोमिला थापर: क्योंकि ये मौलिक है। अगर पाठ्यपुस्तकों को, ख़ास तौर पर इतिहास को बदलते हैं तो आप भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के अपने सिद्धांत को सही साबित करने में कामयाब हो जाते हैं। ये इतिहास पर सबसे ज़्यादा निर्भर हैं। क्योंकि हिन्दू राष्ट्र की जो विशेषताएँ हैं वो ये हैं कि प्रथम नागरिक हिन्दू है। और हिन्दू वो है जिसके पूर्वजों का जन्म भारत में हुआ था, और जिसके धर्म की शुरुआत भारत में हुआ था। इसकी वजह से बाक़ी सब- ईसाई, मुस्लिम, पारसी वगैरह ख़ुद ही अलग कर दिये गए हैं।

    मैं आपको कुछ उदाहरण देती हूँ। आजकल जो बहस बहुत चर्चा में है, कि वो कहते हैं हम सब "आर्य" भारत में उत्पन्न हुए थे क्योंकि वेदों से ही हिन्दू धर्म की स्थापना हुई है, इस वजह से आर्य बाहर से नहीं आ सकते थे, वो यहीं पर थे। ये उन सबूतों- भाषा विज्ञान, पुरातत्व-संबंधी और तमाम जीव-संबंधी सबूतों से मेल नहीं खाता जो हमको(इतिहासकार) मिलते हैं। ये सबूत इन दावों को पूरी तरह से ख़ारिज करते हैं। एक और उदाहरण है, कि वो कहते हैं कि क़ुतुब मीनार सममुद्रगुप्त ने बनवाया था। जबकि वो क़ुतुब मीनार बनने के 700-800 साल पहले थे। इस बात को साबित करने के कोई सबूत नहीं मिले हैं, यहाँ तक कि क़ुतुब मीनार के पास जो मंदिर है, वो भी गुप्ता काल का नहीं है। इसलिए ये बात कोरी बकवास है।

    करण थापर: इस सत्ता ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का जिस तरह से चित्रण किया है। मोदीजी और अरुण जेटली जब जेएनयू के छात्रों, जैसे कन्हैया कुमार या उमर ख़ालिद की बात करते हैं तो उन्हें "टुकड़े-टुकड़े गैंग" कहते हैं।

    मोदी सरकार ये भी मानती है कि जेएनयू लेफ़्ट-विंग के कट्टरवाद का गढ़ है, हालांकि जेएनयू को अभी क़रीब 50 साल ही हुए हैं, जैसा कि आपको पता है। क्या आप जेएनयू के इस चित्रण से सहमत हैं?

    रोमिला थापर: मैं इससे क़तई सहमत नहीं हूँ। ये सिर्फ़ एक राजनीतिक बात है, जो कि बे-बुनियादी है। मैं आपको थोड़ा पीछे ले जाती हूँ, जब हमने जेएनयू कि शुरुआत की, मैं स्थापना करने वाले 6 प्रोफ़ेसरों में से एक थी। हमारे मन में ये बात थी कि इस जगह को शिक्षा के लिहाज़ से ऊँचे स्तर का बनाना है, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी  एक पहचान बने, और ऐसा हुआ भी, हमने इस बात का पूरा ख़याल रखा। हमें एक ऐसी जगह बनानी थी जहाँ हर बात पर खुली बहस और चर्चा हो सके, चाहे कहीं भी- क्लास में, बाहर, ढाबों पर: और ये चलता रहा। और हमारा तीसरा लक्ष्य ये था कि हम समाज के हर हिस्से से छात्रों को यहाँ ले कर आएँ, क्योंकि शिक्षा के सिद्धांत(एजुकेशन थियोरि) से हम ये जानते हैं कि जितने बड़े हिस्से से छात्रों को लाया जाएगा, उतने ही ज़्यादा होनहार छात्र हमें मिलेंगे। तो सबसे पहले एनडीए ने हम पर हमला करना शुरू किया। उन्होंने कहा कि हम हिन्दू-विरोधी, भारत विरोधी हैं, और उन्होंने हमारे द्वारा लिखी गई पुस्तकों पर हमला किया। मुझे एक "शैक्षिक आतंकवादी" कहा गया था, जो कि मुझे बहुत मज़ेदार लगा क्योंकि ये एक मज़ाहिया मुहावरा है। एनडीए भी काफ़ी व्यवस्थित है। उन्होंने सिर्फ़ जेएनयू ही नहीं, बल्कि उन सभी विश्वविद्यालयों पर हमला किया जहाँ सामाजिक विज्ञान की पढ़ाई मज़बूत रही है। क्योंकि सामाजिक विज्ञान वो शिक्षा है जिसके तहत हम समाज का विश्लेषण करते हैं और जो समाज में हो रहा है, उस पर सवाल करते हैं और जवाब पेश करने की कोशिश करते हैं। और ये बात हर उस सरकार के लिए एक समस्या होती है जो देश में एक तानाशाही रवैये के तहत काम करना चाहती है, और देश को कोई और अलग रूप देना चाहती है। और हम, हिन्दू राष्ट्र के हमेशा से विरोधी रहे हैं।

    करण थापर: मोदी सरकार का ये तर्क है कि जो उन्होंने जेएनयू या आईसीएचआर के साथ किया है, वो पिछली सरकारों ने भी किया है, कि यूनिवर्सिटी में अपने जैसी सोच वालों को लाया गया है। लेकिन फ़र्क़ इतना है, कि इस बार जिन लोगों को वो इन ओहदों पर नियुक्त कर रहे हैं, वो उन लोगों से एकदम उलट विचारधारा के हैं, जो लोग वहाँ पहले थे। वो कहते हैं कि इसी वजह से आप जैसे लोगों को लगता है कि आपको अलग कर दिया है जिस वजह से आप क्रोधित हैं, और उनकी आलोचना करते हैं।

    रोमिला थापर: ऐसा बिलकुल नहीं है। मेरे जैसे लोगों को किसी भी सरकारी कमेटी में रहने या ना रहने से ज़रा भी फ़र्क़ नहीं पड़ता है। हमें ज़िंदगी में कभी भी इस बात का फ़र्क़ नहीं पड़ा है। जब जेएनयू शुरू हुआ, तो हमारे बारे में ये बात होती थी कि हम इकलौता ऐसा संस्थान हैं जहाँ आप उदारवाद और मार्कस्वाद के बारे में खुल कर बात कर सकते हैं, और उन विषयों पर भी बात कर सकते हैं जो इस सरकार की नज़र देशद्रोही हैं या विरोध हैं। और ये विषय हैं कौन से? अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र और एंथ्रोपोलोजी, ये विषय हैं। ये वो विषय हैं, जिनकी इस सरकार को कोई समझ नहीं है। उनके पास इन विषयों के शिक्षाविद नहीं हैं इसलिए वो डरा हुआ महसूस करते हैं। और इस वजह से ये हमले सिर्फ़ जेएनयू पर नहीं हैं, ये हमले जादवपुर यूनिवर्सिटी, हैदराबाद यूनिवर्सिटी, और देश में हर जगह हो रहे हैं।

    करण थापर: मोदी सरकार के पाँच सालों का भारत की शिक्षा पर पर क्या असर पड़ा है?

    रोमिला थापर: इसका सबसे बड़ा असर ये हुआ है कि इन्होंने घुसपैठ(जो कि इनका एक और और मशहूर तरीक़ा है) के ज़रिये इन संस्थानों को नष्ट किया है। जब भी ऐसी कोई स्थिति पैदा होती है जो उनको नागवार है, वो वहाँ अपने लोगों को नियुक्त कर देते हैं। और मैं माफ़ी चाहती हूँ लेकिन इनके ज़्यादातर लोग अनुशासन के मामले में बेहद ख़राब हैं, क्योंकि इनके सामने वो बुद्धिजीवी चुनौतियाँ नहीं आई हैं, जो बाक़ी लोगों के सामने आई हैं। तो ये लोग इस सोच के साथ ऐसे लोगों को लाते हैं कि ये उनके समर्थक हैं, लेकिन दरअसल ये लोग शिक्षा के मामले में निचले स्तर के होते हैं। और इसी वजह से हम इन संस्थानों का स्तर भी गिरता हुआ देखते हैं। इन संस्थानों को ज्ञान के स्तर पर इन चीज़ों को भुगतना पड़ा है। जहाँ तक जेएनयू की बात है, तो अगर ज्ञान के स्तर पर इस सब के विरोध में छात्रों और अध्यापकों ने मिल कर लड़ाई नहीं लड़ी तो ये एक निम्न स्तर की यूनिवर्सिटी बन जाएगी। जेएनयू ख़तरे में है।

    करण थापर: हम नहीं जानते हैं कि इस चुनाव कैम्पेन का और इस चुनाव का क्या नतीजा होगा। लेकिन एक और मोदी सरकार आने पर आपके लिए और उस शैक्षिक दुनिया पर क्या असर होगा?

    रोमिला थापर: ऐसा हुआ तो भारत की शिक्षा पूरी तरह से बंद हो जाएगी। क्योंकि जो चीज़ें लगातार हो रही हैं, लोग पाठ्यक्रम में दख़लअंदाज़ी कर रहे हैं, किस कॉन्फ़्रेंस में आप जा सकते हैं, आप किसी बाहर से बुला सकते हैं, सबके लिए आपको अनुमति लेनी पड़ती है, जो कि अक्सर मिलती नहीं है। यहाँ तक कि जेएनयू में भी अब ऐसा हो रहा है। हर साल हमारे यहाँ मशहूर अर्थशास्त्री कृष्णा भारद्वाज का लेक्चर होता है, जो कि हमेशा से एक हौल में होता था, लेकिन अब हमें उसके लिए प्रशासन से अनुमति लेनी पड़ती है। पिछले साल ये अनुमति नहीं दी गई थी, जिसके बाद हमने कैम्पस ग्राउंड में ये लेक्चर किया। और क्योंकि ये खुले में हुआ था, तो सारे दिन लोग उसमें शामिल रहे थे।

    करण थापर: क्या ऐसी चीज़ें पिछली सरकार के दौरान भी हुई थीं?

    रोमिला थापर: बिलकुल नहीं, हम ऐसा होने ही नहीं देते। हम यूनिवर्सिटी में बुद्धिजीवी सोच को लेकर हमेशा से चिंतित रहते थे। इसी आधार पर जेएनयू की स्थापना हुई थी।

    करण थापर: क्योंकि आपने ये कहा कि "हम पिछली सरकार में ऐसा होने ही नहीं देते", मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि क्या छात्र-नेताओं, एक्टिविस्टों और आप जैसे लोगों की आगे आ कर आंदोलन करने की क्षमता मोदीजी दबाव की वजह से कम हुई है?

    रोमिला थापर: नहीं मैं ये नहीं कहूँगी कि क्षमता कम हुई है, क्योंकि आज भी कई अध्यापक ऐसे हैं जो हो रही चीज़ों को लेकर चिंतित हैं। लेकिन शिक्षण और यूनिवर्सिटी के रोज़मर्रा के कामों में, ऐसे मौक़े आते हैं जब लोग ये कहते हैं कि वो ये सब और नहीं कर सकते, वो थक जाते हैं। वो ये सब छोड़ देते हैं क्योंकि उनकी ज़िंदगी में और भी चीज़ें करने को हैं।

    करण थापर: मैं आपसे चल रहे चुनाव कैम्पेन के बारे में बात करना चाहता हूँ। कई लोगों का मानना है कि मोदीजी अपने पाँच साल के ट्रैक रिकॉर्ड पर चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि वो लगातार पाकिस्तान और आतंकवाद के बारे में एक डर का माहौल बना रहे हैं, और ये प्रदर्शित कर रहे हैं कि सिर्फ़ वही इकलौते हैं जो भारत को बचा सकते हैं। क्या आपको भी ऐसा लगता है?

    रोमिला थापर: ऐसा होता हुआ दिख रहा है। और उदाहरण के लिए अगर आप उनके चुनावी भाषणों को सुनें, तो वो मूर्खतापूर्ण हैं। अमित शाह जा कर सिटीज़ंस बिल(नागरिकों के बिल) की बात करते हैं और वो कहते हैं कि नागरिक वो है, जो हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिख है, उनके ये बताने की ज़रूरत है कि यहाँ और भी लोग हैं। इस परिभाषा के बारे में जो दिलचस्प बात है वो ये है कि जब अंग्रेज़ों ने "हिंदुओं" को परिभाषित किया था, तो उन्होंने कहा था कि हिन्दू में वो लोग शामिल हैं जो हिन्दू, बौद्ध, जैन या सिख हैं। इससे ये दिखता है कि हम उसी कोलोनियल सोच की तरफ़ वापस जा रहे हैं, और ये बहुत डरावना है। भारत में फिर से कोलोनियल सोच वाला राज किसी को नहीं चाहिए।

    करण थापर: आपके हिसाब से भारत की आज की स्थिति को देखते हुए कौन सी सरकार बेहतर होगी? बहुमत वाली बीजेपी की सरकार? या सभी विपक्षी पार्टियों का गठबंधन?

    रोमिला थापर: मेरे हिसाब से गठबंधन, किसी भी हाल में। क्योंकि जो एकजुटता होगी, उसमें भारतीय उपमहाद्वीप में सोचने, काम करने और महसूस करने ज़्यादा गुंजाइशें होंगी। क्योंकि मेरे हिसाब से देश की राजनीति ने आज वो रूप ले लिया है जिसमें केंद्र और उसके इर्द-गिर्द हो रही गतिविधियों का सवाल है। केंद्र, जिसमें कि लगातार ऐसे लोग बढ़ रहे हैं जो देश को हिन्दी-भाषी, हिन्दू धार्मिक आदि की तरह देख रहे हैं। ठीक है, लेकिन इसको केंद्र बना कर नहीं देखना चाहिए, इसको बाहरी क्षेत्रों के तौर पे रखना चाहिए, नहीं तो हम लगातार वही मुश्किलें झेलने पे मजबूर हो जाएंगे जो आज बाक़ी सब बड़े देश झेल रहे हैं।

    करण थापर: क्या आपको ये लगता है कि केंद्र में एक मज़बूत 272 सीट वाली सरकार के मुक़ाबले एक कमज़ोर सरकार भारत के लिए बेहतर है?

    रोमिला थापर: मैं उसे एक कमज़ोर सरकार नहीं कहूँगी। मैं कहूँगी कि ये सरकार बहुलवाद के लिए ज़्यादा चिंतित होगी, बजाय एक छोटे से हिस्से के। और ये बहुलवाद भिन्न होना पड़ेगा। 

    करण थापर: अगर हम विपक्ष की बात करें, क्या आप उनके कैम्पेन से अब तक संतुष्ट हुई हैं?

    रोमिला थापर: नहीं, मेरे हिसाब से उन्हें समझौते में और साथ मिलकर काम करने में और मेहनत करनी चाहिए थी। हालांकि हमें आख़िरकार एक ऐसा घोषणापत्र देखने को मिला है जो कि नीतियों के बारे में बात करता है, लेकिन ये बहुत पहले होना चाहिए था। इस चुनाव के साथ मेरी बुनियादी परेशानी ये है दरअसल हम अपने देश में एक ऐसे पड़ाव पर आ गए हैं, जहाँ विपक्ष के पास कोई लक्ष्य नहीं है, सरकार के पास तो फिर भी हिन्दू राष्ट्र का लक्ष्य है। मैं अपने युवा दिनों को याद करती हूँ जब 1950-60 के दशक में मैंने सबसे पहले काम करना शुरू किया था, और सही मायनों में भारत की नागरिक बनी थी, तब हम लोग बेहद चिंताशील हुआ करते थे कि हम किस तरह का समाज चाहते हैं, वो समाज कैसे बनेगा और उसका दृष्टिकोण क्या होगा! इस समय पर ऐसी कोई चिंता किसी के मन में नहीं है। और मैं सिर्फ़ ये कह सकती हूँ कि हमें इस दृष्टिकोण की ज़रूरत है, और ये आशा है कि इस चुनाव से हमें ये हासिल हो सकेगा।

    करण थापर: मेरा आख़िरी सवाल आपसे ये है, क्या राहुल गांधी प्रधानमंत्री के रूप पे एक उचित चेहरा हैं?

    रोमिला थापर: इस पे तब तक कुछ नहीं कहा जा सकता जब तक कोई इंसान काम ना करे। ये इस पर निर्भर करता है कि उनके सलाहकार कौन लोग हैं, और वो किस तरह की नीतियाँ अपनाते हैं।

    विपक्ष से कोई भी प्रधानमंत्री बने, उनके पास एक दृष्टिकोण होना लाज़मी है कि वो समाज को कहाँ ले जाने वाले हैं, और उनके पास वो लोग होने लाज़मी हैं जो उन्हें बताएँ कि ये कैसे करना है।


    यह एचटीएम  में पहले प्रकाशित एक इंटरव्यू का अनुलेखन है|

    Donate to the Indian Writers' Forum, a public trust that belongs to all of us.