• रमणिका गुप्ता : “रुको कि अभी शेष है जिंदगी की जिजीविषा…”

    बजरंग बिहारी

    March 29, 2019

    उनका आवास देश भर से दिल्ली आने वाले दलित, आदिवासी, वामपंथी और नारीवादी रचनाकारों, कार्यकर्ताओं के ठहरने का स्थान था। कई मसलों पर वे अपने तमाम साथियों से सलाह-मशविरा करतीं। उन साथियों में मैं भी यदा-कदा शामिल कर लिया जाता। भोजन का समय हो रहा हो तो बिना खाना खिलाए वे आने नहीं देतीं थीं। राजेन्द्र यादव अपनी कृतियों पर बात करना पसंद नहीं करते थे लेकिन रमणिका जी का स्वभाव भिन्न था। ओम प्रकाश वाल्मीकि ने उनके निबंधों का एक संपादन प्रकाशित कराया था। कँवल भारती, हरीश मंगलम, सुशीला टाकभौरे आदि दलित रचनाकारों से यहीं मिलना होता था। वे चाहती थीं कि मैं भी रमणिका फाउंडेशन का कुछ काम संभालूँ लेकिन व्यस्तता के चलते मुझे हमेशा उनके प्रस्ताव को अस्वीकार करना पड़ता था। मेरे जैसे न जाने कितने समीक्षक, शोधार्थी, विमर्शकार उनके स्नेहभाजन थे। जनवरी, 2019 में जब वे स्वास्थ्य बिगड़ने पर अस्पताल में भर्ती हुईं तो मुझे इसकी खबर लग गई थी। सोचा कि वे स्वस्थ होकर अपने आवास लौटें तो मिलूँगा। 29 जनवरी को उन्हीं का फोन आ गया कि अभी जाने कितने दिन यहाँ रुकना पड़े, मिलने आ जाओ। तय हुआ कि दलित लेखक संघ के अध्यक्ष हीरालाल राजस्थानी, दलित नारीवादी लेखिका अनिता भारती, सुनीता राजस्थानी के साथ रमणिका जी से मिलने चलेंगे। पहली फरवरी की शाम हम चारों लोग उनसे मिले। शुरू में वे बड़ी सुस्त दिखीं। साहित्यिक और वैचारिक चर्चा चल निकली तो उनमें जाने कहाँ से ऊर्जा भर गई| खूब बातें हुईं। उनके पास ‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका के आगामी अंकों, विशेषांकों की योजना रहती थी। सम्मेलनों, संगोष्ठियों की तिथियाँ तय होती थीं। किस अंक में किस विषय पर कौन लिख रहा/रही है, किसको वक्ताओं की सूची में रखना है आदि चीजें उन्हें अच्छे तरीके से याद रहती थीं। बरसों पहले उन्होंने तेलुगु, गुजराती और पंजाबी दलित साहित्य पर पत्रिका के विशेषांक तैयार किए थे। बाद में उन्हें किताब के रूप में छपवाया था। आज इन भाषाओँ के दलित साहित्य पर हिंदी में उपलब्ध यह अनिवार्य सामग्री है। साहित्य अकादमी की तरफ से उनके द्वारा दलित कहानी संचयन तैयार किया गया। यह किताब भी अपने ढंग की अकेली है और संदर्भ ग्रंथ के तौर पर इस्तेमाल की जाती है। रमणिका जी अपनी वैचारिकी में बेशक मार्क्सवादी थीं लेकिन उनके काम करने का तरीका मानवाधिकारवादियों जैसा था। उनकी सक्रियता का रंग-ढंग अस्मितावादियों से साम्य रखता था। उन्होंने वामपंथ और अस्मितावाद के मध्य सहयोग और संवाद बढ़ाने का काम किया था। विभिन्न मंचों और अवसरों पर मैंने उनको जाति और जेंडर के सवाल पर कन्नी काटने वाले कम्युनिस्टों की कठोर आलोचना करते सुना था। उनके संपादकीय हमेशा बड़े धारदार होते थे। वे वर्चस्ववाद के रेशों से बखूबी परिचित थीं और इसकी बखिया उधेड़ने में उन्हें मजा आता था।    

    अभी 22 अप्रैल 2019 को वे नब्बे वर्ष पूरा करतीं। फरवरी में आयोजित आदिवासी रचनात्मकता हेतु एक सम्मान समारोह में कॉम. वृंदा करात ने घोषणा की थी कि इस बार वे रमणिका जी का जन्मदिन धूमधाम से मनाएंगी। उस दिन 11 फरवरी की शाम रमणिका जी सीधे अपोलो अस्पताल से आयोजन स्थल पहुँचीं थीं और तबीयत खराब होने के बावजूद खुले आसमान के नीचे काफी देर रुकी थीं और बड़ा जानदार-शानदार भाषण दिया था।

    18 फरवरी को ‘जनसंदेश टाइम्स’ में मेरा एक लेख छपा- ‘समय पढ़ेगा हवा को, बांचेगा कोयले की चिंगारी को’, लेख रमणिका जी की कविताओं पर केन्द्रित था। रमणिका जी को वह लेख बहुत पसंद आया था। उन्होंने फोन पर लेख की तारीफ की लेकिन कहा कि लेख और बड़ा हो सकता था। मैंने कई बातें संक्षेप में कहीं थीं। उन्हें विस्तार से लिखना चाहता था। चार दिन पहले उनका फोन आया। तब वे अस्पताल से डिफेंस कालोनी अपने घर आ गई थीं। 13 अप्रैल को आंबेडकर जयंती के अवसर पर उनसे मिलना तय हुआ। इस दिन उनके आवास पर रमणिका फाउंडेशन की मासिक गोष्ठी में दलित कवियों का काव्यपाठ रखा गया था। पिछले कई वर्षों से मासिक गोष्ठियों का यह सिलसिला चलता आ रहा है। रचनापाठ और परिचर्चा के स्वरूप वाली इन गोष्ठियों में युवतर से लेकर वरिष्ठ रचनाकारों तक सभी की शिरकत रही है। इन गोष्ठियों में रमणिका जी की प्राथमिकताओं के अनुरूप आदिवासी, दलित, स्त्री और दलित स्त्री रचनाकारों को खास तरजीह मिलती रही है।

    26 मार्च शाम साढ़े तीन के करीब रमणिका जी ने अंतिम साँस ली| उनके कृतित्व का दायरा इतना बड़ा और बहुआयामी है कि आने वाले कई वर्षों तक शोधकर्ता इस काम को करते रहेंगे| रमणिका जी दरअसल ऐसी शख्सियत थीं जिनकी सक्रियता सिर्फ लिखने तक नहीं थी| वे जुझारू कार्यकर्ता थीं, दूरदर्शी नेता थीं, अंतर्दृष्टि से भरी योजनाकार थीं और कुशल आयोजनकर्ता थीं। उन्होंने देश भर के आदिवासियों को दिल्ली में रचनात्मक मंच प्रदान किया था| वे दलित मुद्दों पर खुलकर लिखती थीं और विवादास्पद प्रसंगों में खामोशी अख्तियार करने की बजाय खुलकर अपना पक्ष रखती थीं। बिरसा मुंडा को भगवान मानने का उन्होंने स्पष्ट विरोध किया था| वे आंबेडकर पूजा की मुखालफत करती थीं और अपील करती थीं कि दलित जाति से मुक्त होकर जमात बनें। महिलाओं के उत्पीड़न को वे भली-भांति समझती थीं और फेमिनिस्ट कार्यकर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रदर्शन-आंदोलन में हिस्सा लेती थीं। वे मूलतः ऐसी वामपंथी विचारक थीं जो आर्थिक संसाधनों के पुनर्वितरण की राजनीति में जितना यकीन करती थीं उतना ही विश्वास पहचान की राजनीति में भी करती थीं। सामजिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए इन दोनों धाराओं को मिलना होगा, उन्हें इसकी साफ़ समझ थी| आर.एस.एस. की राजनीति से उन्होंने अनवरत लोहा लिया था, मुकाबला किया था। मेरे जैसे तमाम लेखक उनके संपर्क बनाए रखते थे। पिछले वर्ष 2018 में दलित लेखक संघ ने उन्हें सम्मानित किया था। इसमें मुझे भी अपनी बात रखने का मौका मिला था। मैंने कहा था कि जिस तरह राहुल सांकृत्यायन की जिंदगी का सारा हिसाब लिया जा सकता है कुछ उसी तरह रमणिका गुप्ता का जीवन है। ‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका उनकी पहचान के साथ एकमेक होती गई। इस पत्रिका ने हिंदी को न केवल अन्य स्थापित भारतीय भाषाओँ से जोड़ा अपितु झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओड़िसा से लेकर पूर्वोत्तर की तमाम आदिवासी भाषाओँ के साहित्य से हिंदी को समृद्ध किया।

    जिजीविषा से भरी रमणिका गुप्ता को चार अक्टूबर 2008 की सुबह प्रथम हृदयाघात हुआ था। उस वक्त उन्होंने कविता लिखी थी, ‘मैं हवा को पढ़ना चाहती हूँ’। आज उनके न रहने पर उनकी स्मृति को नमन करते हुए उस कविता का यह अंश उद्धृत कर रहा हूँ-

    “मैंने उड़ती हुई हवा से कहा-
    ‘तनि रुको और सुनो
    अपने प्राणों में बंधी घंटियों की ध्वनि
    जो पैदा करती है हर झोंके के साथ
    एक नया गीत जिंदगी का
    रुको कि अभी शेष है जिंदगी की
    जिजीविषा, प्राण और सांस
    शेष है धरती, आकाश और क्षितिज!’
    और हवा लौट आई
    श्वास बनकर और
    धड़कने लगी मेरे दिल में…!”


     

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