• उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे…

    सत्यम् तिवारी

    March 7, 2019

    महिला दिवस पर हम बात कर रहे हैं उस शायरी की जो महिलाओं के लिए, या महिलाओं के नाम लिखी गई है। 

    उर्दू शायरी मे महिलाओं को शामिल होने में देर लगी, जिसकी वजह समझना किसी के लिए मुश्किल काम नहीं है। हमारा देश हमेशा से उस संस्कृति का देश रहा है जहाँ महिलाओं को हर तरह की इज्ज़त दी जाती है, लेकिन घर के अंदर रहै ख कर, हालांकि घर के अंदर दी जाने वाली इज्ज़त पर भी सवाल खड़े करना लाज़मी है। बाहर जाने की इजाज़त औरत को देने में इस समाज को बहुत देर लगी और आज भी नहीं ही दे पाया है। 

    उर्दू शायरी में जो शुरुआती दौर की मक़बूल शायरा हमें याद आती हैं, उनमें परवीन शाकिर, फ़हमीदा रियाज़, किश्वर नहीद, ज़हरा निगाह, अहम नाम साबित हुए हैं। लेकिन फिर भी उर्दू शायरी को एक ख़ुशनसीबी ये हासिल हुई है कि औरतों पर शायरी सिर्फ़ औरतों के आने के बाद नहीं हुई, बल्कि आज़ादी के वक़्त और आज़ादी के बाद के उन शायरों ने बेहद अच्छी और ज़रूरी शायरी औरतों पर की हैं। और हम उस शायरी की बात नहीं कर रहे हैं, जिसमें औरतों के जिस्म, उसके बाल, उसकी आँखें, उसकी बेवफ़ाई का ज़िक्र था, हम बात कर रहे हैं उस शायरी की जिसमें औरतों के ज़रूरी मसलों पर बात की गई है, औरतों के मुद्दों पर बात की गई है। 

    इस सब को देखते हुए हमें कुछ ऐसी ज़रूरी नज़्में मिलती हैं जिनमें औरतों को सिर्फ़ एक सामान नहीं माना गया है। कैफ़ी आज़मी, जो कि आज़ादी के बाद के इंक़लाबी शायरों में अहम नाम हैं, एक जगह कहते हैं कि, “औरतों को हमेशा से समझा गया है कि या तो वो बार-बरदारी(बोझ उठाना) का जानवर है, या फिर बिस्तर का खिलौना। हमारे आज़ादी के वक़्त के शायर  जो कि आज़ादी की लड़ाई में शामिल थे, वो भी अपनी पत्नियों, अपनी प्रेमिकाओं से कहते थे कि तुम मेरा इंतज़ार करना, मैं देश आज़ाद कराने जा रहा हूँ। उसके बाद इश्क़ करेंगे। वो लोग ये भूल जाते थे कि वापस वो तो क्या आएंगे, बल्कि उनकी ख़बर आएगी।" 

    Image Courtesy: Cheryl Braganza

    कैफ़ी आज़मी आज़ादी के पहले से ही कम्यूनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए थे। इंक़लाबी शायरी हमेशा से उनके लेखन का अहम हिस्सा रही। कैफ़ी आज़मी ने एक नज़्म लिखी "औरत" जिसमें वो दुनिया कि तमाम औरतों से मुख़ातिब होकर कहते हैं कि "उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे" 

    जहाँ उर्दू शायरी के एक बड़े हिस्से में औरतों को मर्दों से नीचे माना गया है, वहीं कैफ़ी अपनी नज़्म "औरत" में समाज के तमाम दक़ियानूसी ढांचों को तोड़ते नज़र आते हैं। वो लिखते हैं: 

    “तोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत से निकल 
    ज़ोफ़-ए-इशरत से निकाल वहम-ए-नज़ाकत से निकल 
    नफ़्स के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत से निकल 
    क़ैद बन जाए मुहब्बत तो मुहब्बत से निकल
    राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे 
    उठ मिरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे" 

    आज औरतों पे ज़ुल्म बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन शायरी का बड़ा हिस्सा आज भी औरतों को सिर्फ़ एक जिस्म समझ के बैठा है। मुशायरों में, कवि सम्मेलनों में औरतों को एक "चीज़" की तरह आज भी प्रदर्शित किया जा रहा है। ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि हम उन शायरों को याद करें जिन्होंने अपनी शायरी के ज़रिये औरतों को एक ना कोई जानवर माना और ना ही कोई देवी, बल्कि सिर्फ़ एक इंसान माना। एक ख़ालिस इंसान।

    पेश है कैफ़ी आज़मी कि नज़्म "औरत":

     
    उठ मिरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे 
    क़ल्ब-ए-माहौल में लर्ज़ां शरर-ए-जंग हैं आज 
    हौसले वक़्त के और ज़ीस्त के यक-रंग हैं आज 
    आबगीनों में तपाँ वलवला-ए-संग हैं आज 
    हुस्न और इश्क़ हम-आवाज़ ओ हम-आहंग हैं आज 
    जिस में जलता हूँ उसी आग में जलना है तुझे 
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे 

    तेरे क़दमों में है फ़िरदौस-ए-तमद्दुन की बहार 
    तेरी नज़रों पे है तहज़ीब ओ तरक़्क़ी का मदार 
    तेरी आग़ोश है गहवारा-ए-नफ़्स-ओ-किरदार 
    ता-ब-कै गिर्द तिरे वहम ओ तअ'य्युन का हिसार 
    कौंद कर मज्लिस-ए-ख़ल्वत से निकलना है तुझे 
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे 

    तू कि बे-जान खिलौनों से बहल जाती है 
    तपती साँसों की हरारत से पिघल जाती है 
    पाँव जिस राह में रखती है फिसल जाती है 
    बन के सीमाब हर इक ज़र्फ़ में ढल जाती है 
    ज़ीस्त के आहनी साँचे में भी ढलना है तुझे 
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे 

    ज़िंदगी जेहद में है सब्र के क़ाबू में नहीं 
    नब्ज़-ए-हस्ती का लहू काँपते आँसू में नहीं 
    उड़ने खुलने में है निकहत ख़म-ए-गेसू में नहीं 
    जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं 
    उस की आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे 
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे 

    गोशे गोशे में सुलगती है चिता तेरे लिए 
    फ़र्ज़ का भेस बदलती है क़ज़ा तेरे लिए 
    क़हर है तेरी हर इक नर्म अदा तेरे लिए 
    ज़हर ही ज़हर है दुनिया की हवा तेरे लिए 
    रुत बदल डाल अगर फूलना फलना है तुझे 
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे 

    क़द्र अब तक तिरी तारीख़ ने जानी ही नहीं 
    तुझ में शो'ले भी हैं बस अश्क-फ़िशानी ही नहीं 
    तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं 
    तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं 
    अपनी तारीख़ का उन्वान बदलना है तुझे 
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे 

    तोड़ कर रस्म का बुत बंद-ए-क़दामत से निकल 
    ज़ोफ़-ए-इशरत से निकल वहम-ए-नज़ाकत से निकल 
    नफ़्स के खींचे हुए हल्क़ा-ए-अज़्मत से निकल 
    क़ैद बन जाए मोहब्बत तो मोहब्बत से निकल 
    राह का ख़ार ही क्या गुल भी कुचलना है तुझे 
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे 

    तोड़ ये अज़्म-शिकन दग़दग़ा-ए-पंद भी तोड़ 
    तेरी ख़ातिर है जो ज़ंजीर वो सौगंद भी तोड़ 
    तौक़ ये भी है ज़मुर्रद का गुलू-बंद भी तोड़ 
    तोड़ पैमाना-ए-मर्दान-ए-ख़िरद-मंद भी तोड़ 
    बन के तूफ़ान छलकना है उबलना है तुझे 
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे 

    तू फ़लातून ओ अरस्तू है तू ज़हरा परवीं 
    तेरे क़ब्ज़े में है गर्दूं तिरी ठोकर में ज़मीं 
    हाँ उठा जल्द उठा पा-ए-मुक़द्दर से जबीं 
    मैं भी रुकने का नहीं वक़्त भी रुकने का नहीं 
    लड़खड़ाएगी कहाँ तक कि सँभलना है तुझे 
    उठ मिरी जान मिरे साथ ही चलना है तुझे 

    कैफ़ी आज़मी के अलावा और भी शायरों ने उस वक़्त में औरतों के मसलों पर कुछ बेहद अच्छी शायरी की है। एक और इंक़लाबी शायर साहिर लुधियानवी ने अलग-अलग वक़्त पर समाज में औरतों की स्थिति पर सवाल खड़े करते हुए काफ़ी कुछ लिखा है। जहाँ कैफ़ी आज़मी औरतों से मुख़ातिब हो कर ये बताते हैं कि दरअसल औरत की असली पहचान क्या है, और क्यों वो समाज की दी हुई पहचान से अलग है, वहीं साहिर औरतों की बदतरीन सामाजिक स्थिति पर सवाल करते दिखते हैं। 

    पेश है साहिर की नज़्म जिसमें कहा गया है कि "औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया" 

    औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया 
    जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया 
    तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में 
    नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में 
    ये वो बे-इज़्ज़त चीज़ है जो बट जाती है इज़्ज़त-दारों में 
    औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया 

    मर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवा औरत के लिए रोना भी ख़ता 
    मर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ा 
    मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता 
    औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया 

    जिन सीनों ने इन को दूध दिया उन सीनों को बेवपार किया 
    जिस कोख में इन का जिस्म ढला उस कोख का कारोबार किया 
    जिस तन से उगे कोंपल बन कर उस तन को ज़लील-ओ-ख़्वार किया 
    संसार की हर इक बे-शर्मी ग़ुर्बत की गोद में पलती है 
    चकलों ही में आ कर रुकती है फ़ाक़ों से जो राह निकलती है 

    मर्दों की हवस है जो अक्सर औरत के पाप में ढलती है 
    औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया 

    औरत संसार की क़िस्मत है फिर भी तक़दीर की हेटी है 
    अवतार पयम्बर जन्नती है फिर भी शैतान की बेटी है 
    ये वो बद-क़िस्मत माँ है जो बेटों की सेज पे लेटी है 
    औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया 


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