• India 2019: छप्पन इंच का सीना और अन्य कवितायेँ

    राहुल राय

    December 14, 2018

    From the Editors:

    Is this the India we want?

    A country in which citizens are murdered or attacked for being rational; for being critical, for raising a voice of dissent; for just being themselves, Muslim or Dalit or women. Intimidation, threats. Hatred. Lynching. Sickening violence. Students and teachers given the choice between being leashed in thought and word, or being hounded as seditious. Institutions built over the years weakened. The economy and development turned into exercises that mock the needs and aspirations of most people. The secularism, the scientific temper and the rights promised in our Constitution subverted every day. Our democracy, our India, frayed.

    But this is our country. It belongs to us, and we belong to it. We have each other for support. We have our poems and songs and films and essays and fiction and art. Our diverse voices.

    What is the India we want?

    Listen to our fellow citizens speak of the country they don’t want and the India they want on the series India 2019 on the Indian Cultural Forum and Guftugu.


    Untitled, Woodcut, shellac and acrylic on paper on canvas, 1996 | Image Courtesy: Metropolitan Museum of Art

    छप्पन इंच का सीना

    आयतें गल रही हैं। 
    गीता जल रही है। 
    गोलियां चल रही हैं। 
    पत्थर गिर रहे हैं। 
    लहू बह रहा है। 
    हवा का रंग बदल रहा है। 
    झील का रंग बदल रहा है। 
    किन्तु 
    वह डांडियों से ड्रम बजा रहा है, 
    अपना छप्पन इंच का सीना थपथपा रहा है। 

     

    लंठन की पावर 

    लंठन लिए हाथ में पावर 
    अपना रंग दिखाते हैं 
    यादों की सुंदरता से 
    इतना क्यों कतराते हैं। 
    लिए हाथ में कंठी माला 
    अवगुण को गुण बतलाते हैं 
    शिशुवों के हत्यारे ये 
    अपना इतिहास छपाते हैं।
    मान अभिमान की चोली में 
    ये घंटों खर्राटे लेते हैं 
    असली फैली सच्चाई को 
    बेशर्मी से पीठ दिखते हैं। 
    बन्दूक, बारूद, बुलेट ट्रेन पर 
    बत्तीसी चमकाते हैं 
    भूख बाढ़ से मरे जो जनता, उसे 
    आम बात बतलाते हैं। 
    हिंसक के पुजारी ये 
    कलम से घबराते है 
    लिख दो इनकी सच्चाई तो 
    गोली से मरवाते हैं। 
    अहो ! अयोध्या , अहो ! काशी 
    दिन रात चिल्लाते हैं ,
    लम्पट, लुच्चन की सेना ले 
    सरेआम गरियाते 

     

    गिनती

    कहे आती नहीं निदिया 
    शर्म के बोझ के मारे। 
    सिकन अब मिटे कैसे ,
    लहू लिपटा पड़ा है। 
    देखकर भी देखते
    बस देखना रह जाता है। 
    की बोर्ड कुत्सित भरा लगता, 
    विचार मुर्छित पड़ा रह जाता है। 
    इकाईयां झुँझलाती-सी गाती 
    दहाईयां सन्नाटे में जाती 
    मिलती नहीं गिनती
    इस क्रोध के पैमाने की। 

     

    जिंदा था कि मुर्दा वह!

    अपनी आधी बात कहूँ या 
    दुनिया की अफवाह कहूँ।
    जग में है सब सुन्दर-सुन्दर  
    माने या ना माने कोई। 
    कहते है बस बुरा सोचते 
    तुम, 
    सोचो कुछ अच्छा-अच्छा, 
    होगा फिर सब अच्छा-अच्छा,
    जाने दो, 
    खाने दो, 
    उनको गच्चा-गच्चा,
    घोंटने दो, 
    पीटने दो,
    उनको बच्चा-बच्चा,
    खोलो मत तुम चिट्ठा-फट्टा,
    विवाद उठेगा, 
    बात बढ़ेगी , 
    रहने दो सब जैसा,वैसा।
    छोड़ो ट्रम्प-मोदी की बातें ,
    कर लो बस हंसी-ठिठोली।
    बनो चार्वाक जीओ जी भर
    लोन-फ़ोन है भरे पड़े,  
    ये सब तो होता आया है, 
    यह सब होता रहता है, 
    यह सब तो होता ही रहेगा,
    फिर ,
    बिना बात क्यूँ मगज खपाएं। 
    सुनकर उनकी बात निराली, 
    हो गई हलचल मुझे नूरानी, 
    सरपट जूता-चप्पल पहना ,
    भागा ऐसे बिजळी जैसे, 
    रस्ते भर बस यही सोचता, 
    जिंदा था कि मुर्दा वह। 
    (नूरानी- प्रकाशयुक्त)

     

    फेंकू 

    बड़े कर्मठ-से  बैठे ,
    गुमान फेंकते हो। 
    तुम आन फेंकते हो। 
    तुम शान फेंकते हो। 
    अभिमान फेंकते हो। 
    तुम राम फेंकते हो। 
    हनुमान फेंकते हो। 
    तुम अल्लाह फेंकते हो। 
    ईमान फेंकते हो। 
    सबरी के जूठे बेर की करामात फेंकते हो। 
    तुम फेंकते हो सब कुछ ,
    जो है नहीं यहाँ पर। 
    रह रहे इंसान की तो जान छेदते हो,
    तुम क्या फेंकते हो, तुम क्या छेदते हो ,
    है द्वंद में बैठे 
    शब्द दोनों 
    फेंकते और छेदते ।।


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    Rahul Rai is a poet and a playwright. He has worked with theatre groups such as The Players in Delhi, and Motley in Mumbai. He is the co-founder of the theatre company, T for Theatre. He is an editor and contributor to Kachhi kavita, an online journal of poetry in Hindi. His plays include Kaali Ghadi, Shoony Batta Sannata, Daalmot and Virah. His most recent play is Outer Dilli.

    Poems © Rahul Rai

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