• प्रो. मुशीरुल हसन: बहुत सी आवाज़ों की ताक़त

    सादिक़ ज़फ़र

    December 11, 2018

    जब सब लब खामोश थे शायद खामोश कर दिए गए…तब एक आवाज़ उठी जिसने बहुत सी आवाज़ों को ताक़त दे दी।

    बटला हाउस एनकाउंटर के बाद जब मुस्लिम मुहल्लों के मकान मालिकों ने आजमगढ़ के मुस्लिम नौजवानों से किराए पर दिए कमरे खाली कराये, जब छात्रों में एक दहशत का माहौल था, कोई ना तो आजमगढ़ का ज़िक्र सुन्ना चाहता था और ना किसी की हिम्मत होती थी इस एनकाउंटर पर खुलकर बोलने की। ऐसे वक़्त बटला हाउस से सटे जामिआ मिल्लिया इस्लामिया के वाईस चांसलर जनाब मुशीरुल हसन साहब ने जो क़दम उठाये, जो फैसले लिए वो आज भी हर आवामी लीडर के लिए एक मिसाल हैं।

    जामिआ मिल्लिया इस्लामिया के नाम से ही यहाँ के स्टूडेंट्स को केस-स्टडीज के लिए मना कर देने वाले इसी दिल्ली के लोग जब यहाँ के स्टूडेंट्स को पुलिस के हवाले तक कर देते थे ये बग़ैर सोचे हुए की इन बच्चों पर क्या बीतेगी जब उनको पढ़ाई के लिए थाना देखना पड़े।

    बटला हाउस एनकाउंटर के बाद जामिआ मिल्लिया इस्लामिया के गिरफ्तार बच्चों को लीगल एड देने की बात कही, जब वो यूनिवर्सिटी स्टाफ और तमाम स्टूडेंट्स के साथ अमन एकता भाईचारे का पैग़ाम लेकर यूनिवर्सिटी में मार्च करे तो इनमें से सिर्फ लीगल एड वाली बात मीडिया ने दिखाई और खूब शोर किया और एक माहौल बनाया हमारी यूनिवर्सिटी के खिलाफ।

    जिस चीज़ को नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार में खूब चीख चीख कर बयां भी किया। मेरे शब्द ही मेरा विरोध हैं इस व्यक्ति के खिलाफ जो आज मुल्क का प्रधानमंत्री हैं।

    आज उस बात को दस साल हो गए पर आज भी साग़र आज़मी का ये शेर ज़हन में ज़ुल्म की हज़ारों दास्तानें लिए, मुशीर साहब की हिम्मत को सलाम करता हुआ गूंजता है..

    ‘किस तरह भुलाएं हम इस शहर के हंगामे,
    हर दर्द अभी बाक़ी है हर ज़ख़्म अभी ताज़ा है’

    आज हम उस शख्स को खिराज ए अक़ीदत पेश करते हैं जिसने ना सिर्फ स्टूडेंट्स में हिम्मत दी हालात से लड़ने की बल्कि हमारे टीचर्स को भी ये बता दिया की क्लासरूम के बाहर भी अपने स्टूडेंट्स को ऐसे मजबूती देना क्यों ज़रूरी है।

    आप प्रो. मुशीरुल हसन को एक बुध्जीवी, लेखक के रूप में जानते होंगे लेकिन हम उनको जिस लिए याद करते रहेंगे वो हमारी यूनिवर्सिटी का हर स्टूडेंट जो उस दौर में था उनको एक बहादुर, निडर लीडर के रूप में याद करेंगे…


     

    First published in TwoCircles.net.

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