• कविता वीरेन: दो कविताएँ

    वीरेन डंगवाल

    October 13, 2018

    फोटो सौजन्य: अनिर्बान घोष

    सभा

    भीतर वालों ने भितरघात किया
    बाहर वालों ने बहिर्गमन
    अध्यक्ष रूठे कुछ देर को
    संविधान के अनुच्छेदों के निर्देशानुसार
    सदन स्थगित हुआ
    भत्ता मगर मिला सबको

    यों चलती ही रही हमारी सभा
    चलती ही रही मार-काट ।

    गाज़ा का कुत्ता

    वह जो कुर्सी पर बैठा
    अख़बार पढ़ने का ढोंग कर रहा है
    जासूस की तरह
    वह दरअसल मृत्यु का फ़रिश्ता है ।

    क्या शानदार डॉक्टरों जैसी बेदाग़ सफ़ेद पोशाक है उसकी
    दवाओं की स्वच्छ गंध से भरी
    मगर अभी जब उबासी लेकर अख़बार फड़फड़ाएगा,
                                                                                       जो दरअसल उसके पंख हैं
    तो भयानक बदबू से भर जायेगा यह कमरा
    और ताजा खून के गर्म छींटे
    तुम्हारे चेहरे और बालों को भी लथपथ कर देंगे
    हालांकि बैठा है वह समुद्रों के पार
    और तुम जो उसे देख प् रहे हो
    वह सिर्फ तकनीक है
    ताकि तुम उसकी सतत उपस्तिथि को विस्मृत न कर सको

    बालू पर चलते हैं अविश्वसनीय रफ़्तार से सरसराते हुए भारी-भरकम टैंक
    घरों पर बुलडोजर
    बस्तियों पर बम बरसते हैं
    बच्चों पर गोलियां

    एक कुत्ता भागा जा रहा है
    धमाकों की आवाज़ के बीच
    मुंह में किसी बच्चे की उखड़ी बची हुई भुजा दबाये
    कान पूँछ हलके से दबे हुए
    उसे किसी परिकल्पित
    सुरक्षित ठिकाने की तलाश है
    जहाँ वह इत्मीनान से
    खा सके अपना शानदार भोज
    वह ठिकाना उसे कभी मिलेगा नहीं ।


     

    वीरेन डंगवाल (जन्म 5 अगस्त 1947 - मृत्यु 28 सितम्बर 2015 ) एक प्रसिद्ध हिंदी कवि थे . 2004 में उन्हें हिंदी भाषा में अपनी कविता की किताब 'दुश्चक्र में स्रष्टा' के लिए साहित्य अकादमी सम्मान दिया गया . वह एक पत्रकार और अकादमिक थे . वीरेन डंगवाल हिंदी अखबार अमर उजाला समूह के सम्पादकीय बोर्ड से भी जुड़े थे और 1974 से 2010 तक बरेली कालेज में हिंदी भाषा और साहित्य के प्रोफ़ेसर थे.

    ये कवितायें 'नवारुण' से प्रकाशित वीरेन डंगवाल की सम्पूर्ण कविताओं के संकलन 'कविता वीरेन' से अनुमति लेकर पुनर्प्रकाशित की जा रहीं हैं .



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