• सावधान! टीवी स्टूडियो में पहुंच गई है मॉब लिंचिंग… ख़तरनाक हो सकता है टीवी चैनल पर, मुसलमान नाम के साथ, हिंदू राष्ट्र पर बहस में हिस्सा लेना

    टीवी स्टूडियो की स्थिति बद से बदतर होती चली गई है। वहां भी कुछ वैसी ही मानसिकता देखी जा सकती है, जिस तरह से सड़कों पर उन्मादित भीड़ द्वारा लिंचिंग की घटनाएं हो रही हैं...

    शम्सुल इस्लाम

    July 18, 2018

    फोटो सौजन्य: YouTube

    बतौर एक लेखक और थियेटर कर्मी मैं लगातार धार्मिक कट्टरता, धर्मांध राष्ट्रवाद, धर्म आधारित निजी कानूनों के नाम पर महिलाओं के उत्पीड़न और दलितों के खिलाफ हिंसा का पुरजोर विरोध करता आया हूं। इसके लिए मुझे अनेक बार निशाना बनाया गया, अपशब्दों से नवाज़ा गया, गाली-गलौज और धमकियां दी गईं और मेरी खिल्ली उड़ाई गई। मैंने हिंदुत्व की उस राजनीति को लगतार बेनकाब किया है, जिसके अनुसार देश में मुसलमानों और ईसाइयों को नागरिक अधिकारों से महरूम किए जाने की कोशिशें जारी हैं। मैंने बुलंद आवाज में बताया है कि हिंदुत्व की इस राजनीति का मंसूबा देश की कानून व्यवस्था को मनुस्मृति के अनुसार ढालना है, जिसमें हिंदू महिलाओं और शूद्रों/दलितों की हैसियत जानवरों से भी कम आंकी गयी है । हिंदुत्ववादी प्यादे जिस तरह से आम मुसलमानों को ’हरामी’, ’कटुवा’, ’पाकिस्तानी’, ’बलात्कारी’, ’अरब शेखों की नाज़ायज औलाद’, ’आईएस के एजेंट’, ’हिंदू विरोधी’, ’नमक हराम’ आदि कहते रहते हैं, मुझे भी उन्होंने यही इज्जत लगातार बख्शी और यह तक मांग की कि "इसे तुरंत देश से निकाल बाहर कर दिया जाना चाहिए।" इस तरह मेरे प्रति कुत्सा जाहिर करते हुए वे इस्लाम और इसके पैगंबर के बारे में भी बेहद भद्दी और अश्लील भाषा, जिस को लिखना मुश्किल है, का उपयोग करने से नहीं चूकते।

    मजेदार बात यह है, जब मैं पाकिस्तान और बांग्लादेश में महिलाओं और वहां अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के खिलाफ लिखता हूं, इस्लामी साम्राज्यों में कबीलाई पिछड़ेपन, अत्याचार  वहां कायम तानाशाही, तीन-तलाक, बहुविवाह और मुस्लिम महिलाओं को सताने एवं उन्हे दबाने व उत्पीड़न करने के खातिर शरिया को एक औज़ार के रूप में प्रयोग करने के बाबत लिखता हूं तो मुझे ’मुस्लिम विरोधी’, ’यहूदी एजेंट’, ’आरएसएस का दलाल’ और क्या नहीं कहा जाता है। मुझसे यहां तक कहा जाता है कि मैरा नाम शम्सुल इस्लाम (इस्लाम के सूर्य) की जगह दुश्मन-ए-इस्लाम (इस्लाम का दुश्मन) होना चाहिए, मुझे अपना नाम बदल लेना चाहिए।

    इस किस्म की मलामत बेहद तकलीफ़देह है। बावजूद इसके मुझे इस बात को लेकर एक किस्म को इतमिनान भी है कि अगर हिंदू-मुस्लिम दोनों तरह के कट्टरपंथी मुझ पर हमला कर रहे हैंतो इसका मतलब यह है कि मैं सही रास्ते पर हूं। वे लोग जो छुपकर छद्म पहचान के साथ मुझ पर हमले कर रहे हैं, कायर और डरपोक हैं। इनमें वे लोग भी हैं जो जिसका शासन होता है, उसके अनुसार पाला बदल लेते हैं, उसी के साथ अपनी वफादारी जाहिर करने लगते हैं। ध्रुवीकरण की राजनीति और हवा के रुख के साथ बहने लगते हैं।

    भारतीय मीडिया, खासतौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हाल के दिनों में किस कदर हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद के प्रचार-प्रसार का माध्यम बन चुका है, जग जाहिर है। मेरे साथ अक्सर ऐसा हुआ है, हिंदुत्ववादी संगठनों के बारे में जब मैंने कुछ कहा या बताया, मेरी कही बातों को इस तरह से संपादित कर तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया कि मैंने जो कहा उसकी जगह कुछ और बल्कि मेरे कहे के विपरीत प्रचारित कर दिया गया। मैं यहां इसका एक उदाहरण देना चाहूंगा।

    एक प्रमुख टीवी चैनल ने गांधी जी की हत्या पर एक स्टोरी की। बाइट के दौरान मुझसे पूछा गया तो मैंने गांधी की हत्यारे किस संगठन से संबंघित थे, इस बारे में सरदार वल्लभ भाई पटेल के नजरिए की बाबत बताया।

    पटेल उस समय देश के गृह मंत्री थे। गांधी जी की हत्या के तुरंत बाद पटेल हत्यारों की राजनीतिक पहचान, हत्यारे किस संगठन से संबंधित थे इस बारे में स्पष्ट नहीं थे, हालांकि नवंबर 1948 तक आते सरदार ने आरएसएस और हिंदू महासभा को इस हत्या के लिए जिम्मेदार पाया था।

    गांधी जी की हत्या के तुरंत बाद 27 फरवरी 1948 के पत्र में सरदार ने नेहरू से कहा कि आरएसएस इस हत्या की  साजिश में संलिप्त नहीं था, लेकिन उन्होंने तत्कालीन प्रधान मंत्री (नेहरू) को इसी पत्र में यह भी बताया कि “आरएसएस जैसे गुप्त संगठन के मामले में जिसमें कोई रिकॉर्ड, रजिस्टर इत्यादि नहीं है, प्रामाणिक जानकारी हासिल करना कि अमुक व्यक्ति विशेष संगठन का सक्रिय कार्यकर्ता है या नहीं, बेहद कठिन है।“

    इस स्टोरी के प्रायोजक/एंकर श्रीनिवासन जैन ने मेरे द्वारा उल्लेखित सरदार के पत्र का केवल वह अंश ही ले लिया जिसमें कहा गया था कि "आरएसएस हत्या में संलिप्त नहीं था", सरदार के पत्र के उस हिस्से को छोड़ दिया जिसमें उन्होंने लिखा था, “आरएसएस जैसे गुप्त संगठन“ के सदस्य के बारे में प्रमाणिक जानकारी हासिल करना मुश्किल था।

    इस तरह जैन ने अपने निष्कर्ष को साबित करने के लिए मेरी बाइट को इस्तेमाल किया कि गांधी जी की हत्या में किसी हिंदुत्ववादी संगठन की संलिप्तता को कोई ठोस प्रमाण नहीं था।

    दुर्भाग्यवश, टीवी स्टूडियो की स्थिति बद से बदतर होती चली गई है। वहां भी कुछ वैसी ही मानसिकता देखी जा सकती है, जिस तरह से सड़कों पर उन्मादित भीड़ द्वारा लिंचिंग की घटनाएं हो रही हैं। ’मुक्त प्रेस’ के नाम पर एक या दो अपवाद ही बचे हैं। चैनल पर लाइव चर्चाओं के दौरान जो कोई भी हिंदुत्व के बारे में उनके कथानक और झूठ का विरोध करता है, उसे राष्ट्र-विरोधी, हिंदू-विरोधी और पाकिस्तानी करार दे दिया जाता है। आप यदि चैनल की इन चर्चाओं में सम्मिलित हैं और आपके नाम से आपकी मुस्लिम पहचान जाहिर होती है और आप हिंदुत्व कथानक और झूठ को चुनौती देते हैं तो आपके साथ सरेआम दुर्व्यवहार होगा; लांछना, लानत-मलामत की बौछार प्रारंभ कर दी जाएगी; माइक पर और माइक से बाहर धमकियां दी जाएंगी।

    जुलाई (2018) के दूसरे सप्ताह के अंत की बात है। टीवी पर 45 मिनट की एक लाइव डिबेट रखी गई थी। विषय था ‘भारत को हिंदू राष्ट्र होना चाहिए या धर्मनिरपेक्ष’। इस बहस में मुझे भी आमंत्रित किया गया था। बहस की पृष्ठभूमि थी कांग्रेस के सांसद शशि थरूर की एक टिप्पणी, जिसमें थरूर ने कहा था, अगर मोदी 2019 में सत्ता में आए, तो भारत हिंदू पाकिस्तान बन जाएगा। अन्य पैनलिस्टों में भाजपा प्रवक्ता सम्बित पात्रा, 'स्वतंत्र विशेषज्ञ' के बतौर प्रोफेसर कपिल कुमार और कांग्रेस प्रतिनिधि प्रेमचंद मिश्रा थे।

    हिंदू राष्ट्र पर बहस शुरू हो इसके पहले ही प्रोफेसर ने ऐलान किया कि उन मुसलमानों के बारे में चर्चा करना जरूरी है जो तीन तलाक, हलाला और पांच विवाह जारी रखना चाहते हैं। सम्बित इस कोरस में शामिल हो गए, उन्होंने घोषित किया कि हिंदू और हिंदुस्तान समानार्थी हैं और मुख्य खतरा कांग्रेस है जो मुस्लिम राजनीति कर रही है। उन्होंने अतीत में मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं के उत्पीड़न के बारे में बात की।

    मैंने एंकर से पूछा हम किस पर विषय पर चर्चा कर रहे हैं, लेकिन सम्बित और प्रोफेसर बेरोक-टोक अपनी बात कहते रहे।

    मैंने पूछा कि उन्होंने 5 हजार साल की भारतीय सभ्यता के काल में दमन और ज़ुल्म का वर्णन करने के लिए केवल मुस्लिम काल का चयन क्यों किया और यदि मुस्लिम शासकों के अपराधों के लिए सभी भारतीय मुस्लिम जिम्मेदार थे तो माता सीता के अपहरण और द्रोपदी के चीरहरण के लिए कौन जिम्मेदार था और आज किस से बदला लिया जाना चाहिए?

    सम्बित और प्रोफेसर दोनों मुझ पर बरस पड़े, चिल्लाते हुए कहने लगे मैं हिंदू धर्म और माता सीता का अपमान कर रहा हूं।

    हमारे काबिल एंकर ने मुझसे 'बहुत पुराने' इतिहास में नहीं जाने के लिए कहा! सम्बित और प्रोफेसर ने एजेंडा तय कर दिया था कि हिन्दू राष्ट्र पर बहस न होकर मुसलमानों के ज़ुल्मों पर चर्चा होगी।  

    इस बहस में मुझे बलात्कारी, आईएस एजेंट और पाकिस्तान समर्थक बता दिया गया।

    कांग्रेस के मुस्लिम समर्थक चरित्र पर जोर देने के लिए, सम्बित ने 2014 की एक प्रेस क्लिपिंग पेश की, जिसमें लिखा था कि भारत के निर्वाचन आयोग को यह शिकायत प्राप्त हुई थी कि राहुल गाँधी ने घोषणा की थी कि 2014 के चुनावों में यदि मोदी सत्ता में आए तो हजारों मुसलमानों का कत्लेआम होगा।

    क्लिपिंग को इस तरह पेश किया गया गोया कि चुनाव आयोग ने इस पर संज्ञान लेकर राहुल गांधी को झिड़की दी थी। होना तो यह चाहिए था इस मनगढ़ंत आरोप पर कांग्रेस प्रतिनिधि अपना विरोध जाहिर करते, परंतु वे उपहासर्पूण ढंग से बस मुस्कुराते रहे। मुझसे रहा नहीं गयां और संबित से पूछ लिया कि चुनाव आयोग ने इस आरोप पर संज्ञान लिया था या नहीं?

    मेरे सीधे से सवाल का जवाब देने के बजाय सम्बित ने घोषित कर दिया कि राहुल का बचाव करने के लिए कांग्रेस द्वारा चेक के माध्यम से मुझे पैसे दिए गए हैं। अपनी मसख़रों वाली शैली में उन्होंने यह आरोप पांच बार दोहराया। कांग्रेस प्रतिनिधि बस मुस्कुराता रहा। एंकर ने भी इसे हलके में लेकर नजरंदाज करने का ही रवैया अपनाया।

    इस दौरान प्रोफेसर माइक पर मुझे अपमानित करते रहे और इसे यहाँ क्यों बुलाया है, चिल्लाते हुए अपने स्थान से बाहर हो गए (लेकिन स्टूडियो में में ही स्टाफ के लिए रखी एक कुर्सी पर बैठ गए)। वह मांग कर कर रहे थे कि हिंदू राष्ट्र पर मेरी बात सुनने के बजाय, मुझसे तीन-तलाक, हलाला और पांच बार शादी (संख्या 4 से बढ़कर 5 कैसे हो गई कोई नहीं जानता) करने की अनुमति के बारे में पूछा जाना चाहिए।

    ब्रेक के दौरान स्टूडियो में जब हम बैठे हुए थे उन्होंने मुझे ‘हरामी’ और ‘बहनचोद’ जैसी गलियों से नवाज़ा। एंकर, जिससे विषय पर सार्थक बहस के लिए मार्गदर्शन की उम्मीद की जाती थी, हिंदू राष्ट्र का पक्ष पोषण करने वाले, सम्बित और कांग्रेस के प्रतिनिधि, इस सब के बावजूद चुप रहे। अब भी एंकर ने प्रोफेसर साहेब को स्टूडियो छोड़ने के लिए नहीं कहा।   

    अभी और बदतर होना बाकी था, हिंदू राष्ट्र पर चर्चा का समाहार करने के बजाय एंकर ने अचानक घोषणा की कि “शम्सुल इस्लाम मैंने प्रोफेसर कपिल कुमार से इस बाबत आपके जवाब का वायदा किया है कि मुसलमान मुस्लिम महिलाओं के बराबर अधिकार क्यों नहीं देते हैं“, उन्हों ने आगे कहा कि मुस्लिम एक राष्ट्र, एक कानून नहीं चाहते हैं। तीन-तलाक, हलाला और बहुविवाह का प्रचलन जारी रखना चाहते हैं।

    मैंने यह बताने की कोशिश की कि सभी मुस्लिम एक तरह के नहीं हैं। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय का जो भी फैसला होगा सभी उसे मानेंगे। लेकिन एंकर जोर देकर मेरे बारे में कहते रहे कि मैं भी उन मुसलमानों में से हूं, जो इन सभी महिला-विरोधी प्रचलनों के हिमायती हैं।

    एंकर ने इन प्रथाओं के बारे मे मेरे निजी विचार जानना चाहे। मैंने उनसे कहा कि मैं ऐसी सभी चीजों में यकीन नहीं करता हूं।

    इस बहस का अंत प्रोफेसर कपिल कुमार को एंकर के इस सम्बोधन के साथ हुआ, “कपिल सर आपको एक हद तक संतोष होना चाहिए कि आपके प्रश्न पर उत्तर (शम्सुल इस्लाम से) मिल गया।“

    भारत को हिंदू राष्ट्र में परिवर्तित करने के आरएसएस के एजेंडे वाली मूल बहस इस तरह "औरत विरोधी इस्लाम धर्म" की चर्चा पर ख़त्म हुयी!

    यहाँ देखें राष्ट्र की बात का वह एपिसोड.


    यह लेख पहली बार हस्तक्षेप में प्रकाशित किया गया था.

    शम्सुल इस्लाम दिल्ली विश्वविद्यालय के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।

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