• Poem by Saumya Baijal

    Saumya Baijal

    September 2, 2016

    Henri Matisse, 'The Reader, Marguerite Matisse', 1906 / Hugbear
     
    अख़बार
     
    रोज़ सुबह अख़बार 
    आपसे मिलने से पहले
    खुद से मिलता है ।
    रोज़ सुबह ख़ुद में
    कई बदलाव पाता  है ।
     
    ख़बरें नहीं, शायद अब आंकड़े बताता है,
    आज ८०, कल ९० ।
    इंसान के साथ न रह पाने की कमज़ोरियाँ,
    अलग अलग रूप में दिखाता है ।
     
    रोज़ ख़ून में भीगा हुआ,
    चीखों में लिपटा हुआ,
    कहानियों के दर्द से
    सहमा हुआ ।
     
    आज बारूद से,
    कल तलवार से,
    एक दिन मज़हब से 
    और एक दिन रंग से ।
    मौत के अलग अलग कारण 
    ढूंढता सा फिरता है ।
     
    रोज़ सुबह अख़बार ख़ुद में एक बदलाव पाता है ।
     
    कहानियाँ ढूंढता है वह विकास की,
    पर आता उस तक बस अवरोध है,
    बचपन की मासूमियत भी,
    ढूंढने में वह शिकस्त है ।
     
    लिखे हुए पन्नों में
    इंसानियत ढूंढ रहा है वह,
    सब कुछ मिल जाता है उसे,
    कर साबित, कि रहे नहीं इंसान वह ।
     
    रोज़ सुबह अख़बार ख़ुद में एक बदलाव पाता है ।
     
    इतना अलगाव, इतनी हिंसा,
    रोज़ किसी के चिथड़े जो उड़ा दे, वह हिंसा 
    फटे हुए शरीर,
    रोंदी हुई आशा
    फैला हुआ आक्रोश
    चिल्लाता हुआ समाँ ।
     
    कहाँ बहे सबा 
    क्या होगी कहीं ख़ुशबू?
    जब नदियाँ अब बहें ख़ून की,
    क्या रह पाएगा कहीं अब सुकूँ?
     
    रोज़ सुबह अख़बार ख़ुद में एक बदलाव पाता है ।
    खून में लिपटे हुए आंकड़े बताता है ।
    ख़बरें अब चीखती, बिलखती हुई मिला करती है ।
    इंसान में इंसानियत ढूंढा करती हैं ।
     
     
    Saumya Baijal is co-founder of the street theatre group Aatish, and a budding writer and an advertising professional. She has been published in Jankipul, Writer's Asylum, Silhouette Magazine and the Equator Line, and blogs at saumyabaijal.blogspot.com.
     

    Donate to the Indian Writers' Forum, a public trust that belongs to all of us.